{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Neem Ke Phool | Kunwar Narayan","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/00f530e2\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":180,"description":"नीम के फूल |  कुँवर नारायण\n\nएक कड़वी-मीठी औषधीय गंध से\nभर उठता था घर\nजब आँगन के नीम में फूल आते।\n\nसाबुन के बुलबुलों-से\nहवा में उड़ते हुए सफ़ेद छोटे-छोटे फूल\nदो–एक माँ के बालों में उलझे रह जाते\nजब वो तुलसी घर पर जल चढ़ाकर\nआँगन से लौटतीं।\n\nअजीब सी बात है मैंने उन फूलों को जब भी सोचा\nबहुवचन में सोचा।\nउन्हें कुम्हलाते कभी नहीं देखा–उस तरह\nरंगारंग खिलते भी नहीं देखा\nजैसे गुलमुहर या कचनार–पर कुछ था\nउनके झरने में, खिलने से भी अधिक\nशालीन और गरिमामय, जो न हर्ष था\nन विषाद।\nजब भी याद आता वह विशाल दीर्घायु वृक्ष\nयाद आते उपनिषद् : याद आती\nएक स्वच्छ सरल जीवन-शैली : उसकी\nसदा शान्त छाया में वह एक विचित्र-सी\nउदार गुणवत्ता जो गर्मी में शीतलता देती\nऔर जाड़ों में गर्माहट। याद आती एक तीखी\nपर मित्र-सी सोंधी खुशबू, जैसे बाबा का स्वभाव।\n\nयाद आतीं पेड़ के नीचे सबके लिए\nहमेशा पड़ी रहने वाली\nबाघ की दो-चार खाटें :\nनिबौलियों से खेलता एक बचपन…\n\nयाद आता नीम के नीचे रखे\nपिता के पार्थिव शरीर पर\nसकुचाते फूलों का वह वीतराग झरना\n–जैसे माँ के बालों से झर रहे हों–\nनन्हें-नन्हें फूल जो आँसू नहीं\nसान्त्वना लगते थे।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}