{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Vimla Ki Yatra | Savita Singh ","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/0380f905\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":171,"description":"विमला की यात्रा | सविता सिंह\n\nउसे जाना है आज शाम चार बजे रेलगाड़ी से\nजाना है पति के घर से इस बार पिता के घर\nएक घर से दूसरे घर जाते हैं वही\nनहीं होता जिनका अपना कोई घर\n\nबारह साल की उम्र में\nविमला ब्याह दी गई\nजब वह गई पति के घर पहली बार\nउस घर को उसने बनाया अपना\nलीप-पोत कर चमकाया उसे\nकूट-पीस कर हमेशा इकट्ठा किया और रखा\nसाल-भर का अनाज\nधोए सबके पाँव\nसिले सबके उधड़े-फटे कपड़े\nकहते हैं पति का घर होता है पत्नी का घर\n\nइस बार लेकिन\nविमला को जाना है दुख की ऐसी यात्रा पर\nजिसके पार उतर\nजीवन स्वयं अपने पार उतरता है\nदुख से मिल दुख\nकिसी उजाड़ में जा भटकता है\nपति की मृत्यु के बाद औरत का जैसे संसार बदलता है\n\nसुबह से ही ठीक कर रही है विमला\nअपने कपड़े\nसँभाल रही है क़सीदाकारी के लकड़ी वाले फ्रेम\nरेशम के आधे-अधूरे\nउलझे-सुलझे धागे\nवे कपड़े जिन पर काढ़ रखे हैं उसने वे सारे फूल\nजिन्हें प्रकृति भी नहीं खिलाती\nवे फूल जो अमर होते हैं\nऔर सिर्फ़ स्त्री के हृदय में खिलते हैं\nया फिर विमला के लिए\nचुपचाप उसके गुमसुम संसार में\n\nपति की मृत्यु के बाद\nआज शाम चार बजे\nविमला जा रही है अपने पिता के संग\nकुछ दिनों के लिए बहलाने मन\nवह जा रही है रेलगाड़ी से एक ऐसी यात्रा पर\nजिसमें कहीं नहीं आता उसका अपना घर\nमन ही मन इसलिए वह मनाती है\nहे ईश्वर हों जीवन में मेरे ऐसी यात्राएँ अब कम\nहो मेरा एक ही जीवन\nएक अपना घर\nजैसे है मेरी एक आत्मा","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}