{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Jagat Ke Kuchle Hue Path | Harishankar Parsai","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/04860d88\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":128,"description":"जगत के कुचले हुए पथ पर भला कैसे चलूं मैं? | हरिशंकर परसाई\n\nकिसी के निर्देश पर चलना नहीं स्वीकार मुझको\nनहीं है पद चिह्न का आधार भी दरकार मुझको\nले निराला मार्ग उस पर सींच जल कांटे उगाता\nऔर उनको रौंदता हर कदम मैं आगे बढ़ाता\n\nशूल से है प्यार मुझको, फूल पर कैसे चलूं मैं?\n\nबांध बाती में हृदय की आग चुप जलता रहे जो\nऔर तम से हारकर चुपचाप सिर धुनता रहे जो\nजगत को उस दीप का सीमित निबल जीवन सुहाता\nयह धधकता रूप मेरा विश्व में भय ही जगाता\n\nप्रलय की ज्वाला लिए हूं, दीप बन कैसे जलूं मैं?\n\nजग दिखाता है मुझे रे राह मंदिर और मठ की\nएक प्रतिमा में जहां विश्वास की हर सांस अटकी\nचाहता हूँ भावना की भेंट मैं कर दूं अभी तो\nसोच लूँ पाषान में भी प्राण जागेंगे कभी तो\n\nपर स्वयं भगवान हूँ, इस सत्य को कैसे छलूं मैं?","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}