{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Ziladheesh | Alok Dhanwa","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/0689276f\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":165,"description":"ज़िलाधीश | आलोक धन्वा \n\nतुम एक पिछड़े हुए वक्ता हो। \nतुम एक ऐसे विरोध की भाषा में बोलते हो \nजैसे राजाओं का विरोध कर रहे हो! \nएक ऐसे समय की भाषा \nजब संसद का जन्म नहीं हुआ था! \nतुम क्या सोचते हो \nसंसद ने विरोध की भाषा और सामग्री को \nवैसा ही रहने दिया \nजैसी वह राजाओं के ज़माने में थी?\nयह जो आदमी\nमेज़ की दूसरी ओर सुन रह है तुम्हें\nकितने करीब और ध्यान से\nयह राजा नहीं जिलाधीश है!\nयह जिलाधीश है\nजो राजाओं से आम तौर पर\nबहुत ज़्यादा शिक्षित है\nराजाओं से ज़्यादा तत्पर और संलग्न !\nयह दूर किसी किले में - ऐश्वर्य की निर्जनता में नहीं\nहमारी गलियों में पैदा हुआ एक लड़का है\nयह हमारी असफलताओं और गलतियों के बीच पला है\nयह जानता है हमारे साहस और लालच को\nराजाओं से बहुत ज़्यादा धैर्य और चिन्ता है इसके पास\nयह ज़्यादा भ्रम पैदा कर सकता है\nयह ज़्यादा अच्छी तरह हमे आज़ादी  से दूर रख सकता है\nकड़ी\nकड़ी निगरानी चाहिए\nसरकार के इस बेहतरीन दिमाग पर !\nकभी-कभी तो इससे सीखना भी पड़ सकता है !","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}