{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Pagli Arzoo | Nasira Sharma","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/06ec2db6\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":171,"description":"पगली आरज़ू | नासिरा शर्मा\nकहा था मैंने तुमसे\nउस गुलाबी जाड़े की शुरुआत में\nउड़ना चाहती हूँ मैं तुम्हारे साथ\nखुले आसमान में\nचिड़ियाँ उड़ती हैं जैसे अपने जोड़ों के संग\nनापतीं हैं आसमान की लम्बाई और चौड़ाई\nनज़ारा करती हैं धरती का, झांकती हैं घरों में\nपार करती हैं पहाड़, जंगल और नदियाँ\nफिर उतरती हैं ज़मीन पर, चुगती हैं दाना\nसुस्ताती किसी पेड़ की शाख़ पर\nअलापतीं हैं कोई गीत  प्रेम का\nजब उमड़ता है प्यार तो गुदगुदाती हैं\nअपनी चोंच से एक दूसरे को\nउसी तरह मैं प्यार करना चाहती हूँ तुम्हें\nलब से लब मिला कर, हथेली पर हथेली रखकर\nजैसे वह सटकर बैठते हैं अपने घोंसले में\nवैसे ही रात को सोना चाहती हूँ तुम से लिपट कर\nआँखों में नीले आसमान के सपने भर\nइस खुरदुरी दुनिया को सलामत बनाने के लिए।\nमैं उड़ना चाहती हूँ तुम्हारे संग ऊँचाइयों पर\nजहाँ मुलाक़ात कर सकूँ सूरज से\nउस डूबते सूरज को पंखों में छुपा लाऊँ\nलौटते हुए उगे चाँद के चेहरे को चूम कर\nचुग लाऊँ कुछ तारे चोरी-चोरी\nफिर उन्हें सजा दूँ धरती के अंधेरे कोनों में।  ","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}