{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Sui | Ramdarash Mishra","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/076c5d52\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":202,"description":"सूई | रामदरश मिश्रा \n\nअभी-अभी लौटी हूँ अपनी जगह पर\nपरिवार के एक पाँव में चुभा हुआ काँटा निकालकर\nफिर खोंस दी गयी हूँ\nधागे की रील में\nजहाँ पड़ी रहूंगी चुपचाप\nपरिवार की हलचलों में अस्तित्वहीन-सी अदृश्य\nएकाएक याद आएगी नव गृहिणी को मेरी\nजब ऑफिस जाता उसका पति झल्लाएगा-\nअरे, कमीज़ का बटन टूटा हुआ है\"\nगृहिणी हँसती हुई आएगी रसोईघर से\nऔर मुझे लेकर बटन टाँकने लगेगी\nपति सिसकारी भर उठेगा\n\"क्यों क्या हुआ, चुभ गयी निगोड़ी?\" गृहिणी पूछेगी।\n\"हाँ चुभ गयी लेकिन सूई नहीं।\"\nदोनों की मुस्कानों के साथ ओठ भी पास आने लगेंगे\nऔर मैं मुस्कराऊँगी अपने सेतु बन जाने पर\nमैं खुद नंगी पड़ी होती हूँ\nलेकिन मुझे कितनी तृप्ति मिलती है\nकि मैं दुनिया का नंगापन ढांपती रहती हूँ\nशिशुओं के लिए झबला बन जाती हूँ\nऔर बच्चों, बड़ों के लिए\nकुर्ता, कमीज़, टोपी और न जाने क्या-क्या\nकपड़ों के छोटे-बड़े टुकड़ों को जोड़ती हूँ\nऔर रचना करती रहती हूँ आकारों की\nआकारों से छवियों की\nछवियों से उत्सवों की\nकितना सुख मिलता है\nजब फटी हुई गरीब साड़ियों और धोतियों को\nबार-बार सीती हूँ\nऔर भरसक नंगा होने से बचाती हूँ देह की लाज को\nजब फटन सीने के लायक नहीं रह जाती\nतो  चुपचाप रोती हूँ अपनी असमर्थता पर\nमैं जाड़ों में बिछ जाती हूँ\nकाँपते शरीरों के ऊपर-नीचे गुदड़ी बनकर\nऔर उनकी ऊष्मा में अपनी ऊष्मा मिलाती रहती हूँ ।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}