{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Prem Aur Ghruna | Priyadarshan","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/077f1487\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":158,"description":"प्रियदर्शन - प्रेम और घृणाप्रेम पर सब लिखते हैं,घृणा पर कोई नहीं लिखता,जबकि कई बार प्रेम से ज्यादा तीव्र होती है घृणाप्रेम के लिए दी जाती है शाश्वत बने रहने की शुभकामना,लेकिन प्रेम टिके न टिके, घृणा बची रहती है।कई बार ऐसा भी होता हैकि पहली नज़र में जिनसे प्रेम होता हैदूसरी नज़र में उनसे ईर्ष्या होती हैऔरअंत में कभी-कभी वह घृणा तक में बदल जाती है।यह तजबीज कभी काम नहीं आतीकि सबसे प्रेम करो, ईर्ष्या किसी से न करोऔर घृणा से दूर रहो।हमारे समय में नहीं, शायद हर समयप्रेम की परिणतियां कई तरह की रहींकभी-कभी ईर्ष्या भी बदलती रही प्रेम मेंलेकिन ज़्यादातर प्रेम बदलता रहाकभी-कभी ईर्ष्या और घृणा तक मेंऔर अक्सर ऊब और उदासी में।हालांकि कामना यही करनी चाहिएकि इस परिणति तक न पहुँचे प्रेमऔर कई बार ऐसा होता भी हैकि ऊब और उदासी और ईर्ष्या और नफऱत के नीचेभी तैरती मिलती है एक कोमल भावनाजिसे ज़िन्दगी की रोशनी सिर्फ़ प्रेम की तरह पहचानती है।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}