{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Kapas Ke Phool | Kedarnath Singh","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/07e36cd2\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":165,"description":"कपास के फूल - केदारनाथ सिंह \n\nकपास के फूल\n वे देवता को पसंद नहीं \nलेकिन आश्चर्य इस पर नहीं \nआश्चर्य तो ये है कि कविगण भी \nलिखते नहीं कविता कपास के फूल पर\nप्रेमीजन भेंट में देते नहीं उसे\nकभी एक-दूसरे को \nजबकि वह है कि नंगा होने से\nबचाता है सबको\nऔर सुतर गया मौसम\nतो भूख और प्यास से भी \nबचाता है वह\n\nईश्वर को तो ठण्ड लगती नहीं \nवैसे नंगा होना भी\nवहाँ उतना ही सहज है\nउतना ही दिव्य \nइसलिए इतना तय है कि ठंड के विरुद्ध \nआदमी ने ही खोजा होगा\nपृथ्वी पर पहला कपास का फूल\n\nपर पहला झिंगोला \nकब पहना उसने\nपहले तागे से पहले सुई की\nकब हुई थी भेंट \nयह भूल गई है हमारी भाषा\nजैसे अपनी कमीज़ पहनकर\nभूल जाते हैं हम\nअपने दर्ज़ी का नाम\n\nपर क्या कभी सोचा है आपने\nवह जो आपकी कमीज़ है\nकिसी खेत में खिला\nएक कपास का फूल है\nजिसे पहन रखा है आपने\n\nजब फ़ुर्सत मिले\nतो कृपया एक बार इस पर सोचें ज़रूर\nकि इस पूरी कहानी में सूत से सुई तक \nसब कुछ है\nपर वह कहाँ गया \nजो इसका शीर्षक था।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}