{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Dada Ki Tasveer | Manglesh Dabral ","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/08072dc2\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":163,"description":"दादा की तस्वीर | मंगलेश डबराल \n\nदादा को तस्वीरें खिंचवाने का शौक़ नहीं था\nया उन्हें समय नहीं मिला\nउनकी सिर्फ़ एक तस्वीर गन्दी पुरानी दीवार पर टँगी है\nवे शान्त और गम्भीर बैठे हैं।\nपानी से भरे हुए बादल की तरह\nदादा के बारे में इतना ही मालूम है\nकि वे माँगनेवालों को भीख देते थे\nनींद में बेचैनी से करवट बदलते थे\nऔर सुबह उठकर\nबिस्तर की सिलवटें ठीक करते थे\nमैं तब बहुत छोटा था\nमैंने कभी उनका गुस्सा नहीं देखा\nउनका मामूलीपन नहीं देखा\nतस्वीरें किसी मनुष्य की लाचारी नहीं बतलातीं\nमाँ कहती है जब हम\nरात के विचित्र पशुओं से घिरे सो रहे होते हैं\nदादा इस तस्वीर में जागते रहते हैं।\nमैं अपने दादा जितना लम्बा नहीं हुआ\nशान्त और गम्भीर नहीं हुआ\nपर मुझमें कुछ है उनसे मिलता-जुलता\nवैसा ही क्रोध वैसा ही मामूलीपन\nमैं भी सर झुकाकर चलता हूँ\nजीता हूँ अपने को एक तस्वीर के खाली फ्रेम में\nबैठे देखता हुआ।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}