{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Baarish | Nemichandra Jain","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/08932864\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":190,"description":"बारिश - नेमिचंद्र जैन\nबारिश सुबह हुई थी \nजब फुहारों से नहाए थे पेड़ \nघर-द्वार \nबच्चे \nलोगों के मन \nऔर अब शाम को \nपश्चिम में रंगों का मेला भरा है \nलाल और सुनहरे की कितनी रंगते हैं \nऊदे-साँवले बादलों को लपेटे \nकमरे में उमस के बावजूद \nबाहर हवा में सरसराहट है \nतरावट भरी \nछतों पर बच्चे नौजवान \nऔर अधेड़ भी \nपतंगें उड़ा रहे हैं \nचारों तरफ़ \nकिलकारियाँ, खिलखिलाहट, भाग-दौड़ \nपतंगें कटने या काटने की सनसनी है \nतमाम परेशानियों, दुश्चिंताओं को \nमुँह चिढ़ाती उत्तेजना है \nज़िंदगी की \nकोई शर्मीली लड़की \nएक छत की मुँडेर से टिक कर \nखड़ी है \nकिसी ख़याल में खोई हुई \nशायद हवा में डगमगाती \nउठती-गिरती-नाचती पतंगों में \nअपनी ज़िंदगी की \nकोई तस्वीर देखती \nया आसमान के रंगों में \nकोई अनलिखी इबारत बाँचती \nपहचानती \nयह पल \nकितना ख़ुशनुमा, सुहावना \nसुनहरी संभावनाओं से भरपूर है \nअपने आप में संपूर्ण, सार्थक \nअविस्मरणीय \nभले ही थोड़ी देर में \nरंगों का मेला उठ जाएगा \nबच्चे, नौजवान, अधेड़ \nशायद कमरों में जाकर \nदूरदर्शन पर चित्रहार देखने लगेंगे \nशर्मीली लड़की रसोई में लौटकर \nबढ़ती हुई महँगाई से खीझी \nसब्ज़ी काटती माँ से \nडाँट खाएगी \nऔर जीवन फिर अपने पुराने ढर्रे पर चल पड़ेगा। ","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}