{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Tedhi Kamar KI Auratein | Aishwarya Vijay Amrit Raj","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/098edb03\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":266,"description":"टेढ़ी कमर की औरतें | ऐश्वर्य विजय अमृत राज\n\nछः-सात साल की लड़कियाँ\nछोटे भाइयों/बड़े भाई के बच्चे के साथ/\nसोलह साल की\nसालभर पुरानी कन्याएँ\nअपने बच्चे/जेठानी के बच्चे के साथ\nचालीस-साठ की दादी/नानी\nकमर एक तरफ निकालकर\nबच्चे को लटकाए कुल्हे की हड्डी से, \nहो जाती हैं पेड़ के किसी टेढ़े तने सी तिरछी, \nऔर ठोंस, किसी पुरानी सभ्यता की मूर्ति सी,\nजो टिकी-बची हो हर मौसम व समय की मार से।\nकमर टेढ़ी किये ये औरतें धड़फड़ा कर चढ़ जाती हैं कई सीढ़ियाँ एक साथ\nहल्के कदम से टहलत जाती हैं गाँव के एक छोर से दूसरे छोर तक,\nझुककर उठा लेती हैं सारे बर्तन,\nउचक कर चढ़ा देती हैं सबसे ऊपर की दराज़ पर मसाले के डिब्बे,\nसरकस के सारे करतब निभा लेंगी ये औरतें, \nकमर से दो हाँथ जितने बड़े बच्चे लटकाये अपने शरीर से किसी भी दिन..\n'कर्मा' की रात तेज़ी से लगाती हैं दुब घास से भरी बाल्टी के चक्कर\nखाली पेट, गाते हुए भाइयों की सलामती के लिए माँ व गाँव की अन्य औरतों से सीखे हुए गीत,\nमायके लौटी लड़कियाँ नाचती हैं शर्मीली सखी की बाँह खींचते हुए,\nकहती हैं, \"अब त अलगे साल अयते ई मौका\"\nगाते हुए गीत,\nवे मन से भूल जातीं हैं वे सारे तिरस्कार जो मिलते हैं उसे औरत के शरीर में 'बहन' होने के कारण,\nगीत जो करते हैं केवल भाईयों के गुणवान, उनके अस्तित्व की स्तुति,\nउनकी धुन पर पिटती हैं चूड़ियाँ खनका-खनका तालियाँ…\nसाल भर की आज़ादी इस एक पल में जीते हुए\nससुराल लौटने का ख़्याल, छः बजते ही किबाड़ से अंदर हो जाने के नियम, \nसभी को डाल बाल्टी में\nइस रात नाच लेना चाहती हैं कुछ मिनटों में इतना कि दुखे पैर अगली सुबह तक…\nताकि इस दर्द को हर दिन याद करें और खुश हो लें उसके पैर जब ससुराल में रखें जाएँ नाप-तौल कर।\nदोपहर की धूप में जीप खड़ी कर ड्राइवर पसीने से लथपथ मन ही मन कोस रहा है औरतों की जमात को\nलड़की धीरे धीरे बढ़ती है जीप की तरफ,\nमाँ बार-बार पोंछती है अपने आँसू\nउसके बच्चों का मामा\nकभी पुचकार कर\nकभी आँखें दिखाकर\nरख देता है जीप की सीट पर बैठे जीजा की गोद में बच्चे को,\nपिता इशारे में कहता है लड़की को बन्द करने जीप का दरवाज़ा\nगाड़ी स्टार्ट करते हुए ड्राइवर लेता है लम्बी साँस\nगहरी सांस छोड़ती है ससुराल लौटती लड़की।\nगाँव भर की औरतें जो खड़ी थीं गाड़ी को घेरे\nहटने लगतीं हैं एक-एक कर\nऔर कमर से अलग-अलग रिश्तों के बच्चे लटकाये\nऔरतें\nऔरतें लग जातीं हैं अपने अपने कामों में।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}