{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Wahi Nahi Tha Premi | Anupam Singh","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/09b77357\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":163,"description":"वही नहीं था प्रेमी | अनुपम सिंह\n\nकिसी दिन तुम पूछोगे मेरे प्रेमियों के नाम\nमैं अपना निजी कहकर टाल जाऊँगी\nलेकिन प्रेमी वही नहीं था\nजिसने कोई वादा किया और निभाया भी\nजिसके साथ मैं पाई गई\nसिविल लाइंस के कॉफी हाउस में\nजिसके साथ बहुत सारी कहानियाँ बनीं\nऔर शहर की दीवार पर गाली की तरह चस्पां की गई\nवह भी था जिसके आगोश में\nजाड़े की आग मुझे पहली बार प्रिय लगी\nजिसने कोई वादा नहीं किया\nऔर स्वप्न टूटने से पहले ही चला गया\nमैं वह आग हर जाड़े में जलाती हूँ\nवह भी जिसके सम्मुख मैंने\nसबसे झीना वस्त्र पहना\nफिर धीरे-धीरे उतार दिया\nजो मुझे नहीं किसी और को प्रेम करता था\nऔर अपनी आँखें फेर लीं\nमेरी स्थूल देह से आँख फेरने वाले पुरुष की याद में\nमैं अक्सर अपना वस्त्र उतार देती हूँ\nप्रेमी वही नहीं था\nजो देह के सभी संस्तरों से गुज़र फूल-सा खिला\nऔर मैं भी आवें-सी दहकी\nवह भी था जिसे पाने की वेदना में मेरी बाँहैं\nवल्लरी-सी फैलती चली गईं\nजो अभी नहीं लौटा है\nउसके औचक ही मिलने की आस है।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}