{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Sugiya | Nirmala Putul","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/0a3b2aa7\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":172,"description":"सुगिया | निर्मला पुतुल\n‘सुगिया, तुम्हारे होंठ सुग्गा जैसे हैं’ एक ने कहा \n‘सुगिया, तुम्हारे होंठ सुग्गा जैसे हैं’ एक ने कहा \nसुगिया हँस पड़ी खिलखिला कर \n‘तुम हँसती हो तो बहुत अच्छी लगती हो सुगिया’ \nबादलों में बिजली से चमकते उसके दाँतों को देख दूसरा बोला।\n \nतीसरा ने फ़रमाया, ‘तुम बहुत अच्छा गाती हो बिल्कुल कोयल की तरह\nऔर नाच का तो क्या कहना, धरती नाच उठती है जब तुम नाचती हो’\nचौथे ने उसकी आँखों की प्रसन्नसा में क़सीदे पढ़े,\nचौथे ने उसकी आँखों की प्रसन्नसा में क़सीदे पढ़े,\n‘तुम्हारी बड़ी-बड़ी आँखें बिल्कुल बड़ी ख़ूबसूरत हैं सुगिया\nबिल्कुल हिरणी के माफिक, \nतुम पास आकर यहीं बैठी रहो, मुझे देखती रहो\nपँचवाँ जो बिल्कुल क़रीब था और चुप-चुप \nउसने चुपके से कान में कहा, \n‘मुझसे दोस्ती करोगी सुगिया, सोने की सिकड़ी बनवा दूँगा तुझे’\nसुनकर उदास हो गई सुगिया, \nरहने लगी गुमसुम, भूल गई हँसना, गाना, नाचना–\nसुबह से शाम तक दिन भर मरती-खटती सुगिया \nसोचती है, अक्सर, यहाँ हर पाँचवा आदमी उससे \nउसकी देह की भाषा में क्यों बतीयाता है\nकाश! कोई कहता तुम बहुत मेहनती हो सुगिया\nबहुत भोली और ईमानदार हो तुम\nकाश! कहता कोई ऐसा।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}