{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Neembu Maangkar | Chandrakant Devtale","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/0bf5522a\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":262,"description":"नीम्बू माँगकर | चन्द्रकान्त देवताले\n\nबेहद कोफ़्त होती है इन दिनों\nइस कॉलोनी में रहते हुए\nजहाँ हर कोई एक-दूसरे को\nजासूस कुत्ते की तरह सूँघता है\nअपने-अपने घरों में बैठे लोग वहीं से कभी-कभार\nटेलीफोन के ज़रिये अड़ोस-पड़ोस की तलाशी लेते रहते हैं\nपर चेहरे पर एक मुस्कान चिपकी रहती है\nजो एक-दूसरे को कह देती है — \" हम स्वस्थ हैं और सानंद\nऔर यह भी की तुम्हें पहचानते हैं, ख़ुश रहो \",\nयहाँ तक भी ठीक है\nपर अजीब लगता है की घरु ज़रूरतों के मामले में\nसब के सब आत्मनिर्भर और बढ़िया प्रबंधक हो गए हैं\nपुरानी बस्ती में कोई दिन नहीं जाता था\nकी बड़ी फज़र की कुण्डी नहीं खटखटाई जाती\nऔर कोई बच्चा हाथ में कटोरी लिए नहीं कहता 'बुआ\nमाँ ने चाय-पत्ती मँगाई है'\nकिसी के यहाँ आटा खुट जाता\nऔर कभी ऐन छौंक से पहले\nप्याज, लहसुन या अदरक की गाँठ की माँग होती\nहोने पर बराबर दी जाती चाहे कुढ़ते-बड़बड़ करते हुए\nपर यह कुढ़न दूसरे या तीसरे दिन ही\nआत्मीय आवाज़ में बदल जाती\nजब जाना पड़ता कहते हुए\nभाभी ! देख थोड़ी देर पहले ही ख़त्म हुआ दूध\nऔर फिर आ गए हैं चाय पीने वाले\nरोज़मर्रा की ऐसी माँगा-टूँगी की फेहरिस्त में\nऔर भी कई चीज़ें शामिल रहतीं\nजैसे तुलसी के पत्ते या कढ़ी-नीम\nबेसन-बड़े भगोने, बाम की शीशी\nऔर वक़्त पड़ने पर दस-बीस रुपए भी\nऔर इनके साथ ही आपसी सुख-दुःख भी बँटता रहता\nजो इस पृथ्वी का दिया होता प्राकृतिक\nऔर दुनिया के हत्यारों का भी\n\nपर इस कॉलोनी में लगता है\nसभी घरों में अपने-अपने बाज़ार हैं और बैंकें भी\nपर नीम्बू शायद ही मिले\nहाँ ! नीम्बू एक सुबह मैं इसी को माँगने दो-तीन घर गया\nपद्मा जी, निर्मला जी, आशा जी के घर तो होने ही थे\nनीम्बू क्यूँकि इसके पेड़ भी हैं उनके यहाँ\nपर हर जगह से 'नहीं है' का टका-सा जवाब मिला\nमैंने फ़ोन भी किए\nदीपा जी ने तो यहाँ तक कह दिया\n'क्यों माँगते है आप मुझसे नीम्बू'\nमै क्या जवाब देता\nबुदबुदाया — इतने घर और एक नीम्बू तक नहीं\nउज्जैन फ़ोन लगाकर\nकमा को बताया यह वाक़या\nवहीं से वह बड़बड़ाई\nवहाँ माँगा-देही का रिवाज़ नहीं\nसमझाया था पहले ही\nफिर भी तुम बाज़ नहीं आए आदत से अपनी\nवहाँ इंदौर में नीम्बू माँगकर तुमने\nयहाँ उज्जैन में मेरी नाक कटवा ही दी\nहँसी आई मुझे अपनी नाक पर हाथ फेरते\nजो कायम मुकम्मल थी और साबूत भी","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}