{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Saarangi | Krishna Mohan Jha ","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/0d997f55\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":178,"description":"सारंगी | कृष्णमोहन झा\n\nउस आदमी ने किया होगा इसका आविष्कार\nजो शायद जन्म से ही बधिर हो\n\nऔर जो अपनी आवाज़ खोजने\nबरसों जंगल-जंगल भटकता रहा हो\n\nया उस आदमी ने\nजिसने राजाज्ञा का उल्लंघन करने के बदले\n\nकटा दी हो अपनी जीभ\nऔर जिसकी देह मरोड़ती हुई पीड़ा की ऐंठन\n\nमुँह तक आकर निराकार ही निकल जाती हो\nअथवा उसने रचा होगा इसे\n\nजो समुद्र के ज्वार से तिरस्कृत घोंघे की तरह\nअकिंचनता के द्वीप पर फेंक दिया गया हो\n\nऔर जिसकी हर साँस पर काँपकर टूट जाती हो\nउसके उफनते हृदय की पुकार\n\nया संभव है\nजिसने खो दिया हो अपना घर-परिवार\n\nसाथ-साथ रोने के लिए किया हो इसका आविष्कार\nइस असाध्य जीवन में\n\nटूटने और छूटने के इतने प्रसंग हैं भरे हुए\nकि इसके जन्म का कारण कुछ भी हो सकता है…\n\nएक पक्षी के मरने से लेकर एक बस्ती के उजड़ने तक\nइसलिए\n\nजीवन के नाम पर जिन लोगों ने सिर्फ दुःख झेला है\nउनकी मनुष्यता के सम्मान में\n\nअपनी कमर सीधी करके सुनिए इसे\nयह सुख के आरोह से अभिसिंचित कोई वाद्य यंत्र नहीं\n\nसदियों से जमता हुआ दुःख का एक ग्लेशियर है\nजो अपने ही उत्ताप से अब धीरे-धीरे पिघल रहा है…","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}