{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Bachhe Ke Shikshak Ko Patra | Rajendra Upadhyay","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/0fa840eb\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":292,"description":"बच्चे के शिक्षक को पत्र - राजेंद्र उपाध्याय \nउसे नदियों और पेड़ों\nऔर पर्वतों के बारे में बताना\nउसे बरगद के बारे में बताना\nतो कली और तुलसी के बारे में भी\nनीम और पीपल, बादल और बिजली\nके बारे में बताना\nअजगर, हाथी, घोड़ों के बारे में बताते हुए\nबेचारे एक केंचुए को न भूल जाना\nउसे जीतना सिखाना\nपर हारने के सुख के बारे में भी बताना\nकमाई की एक पाई बड़ी है\nभीख में मांगे गए रुपए से उसे बताना।\nझूठ बोलकर जीतने से बेहतर है\nखेल हार जाना सच पर रहकर।\nयेे सब सीखने में उसे\nसमय लगेगा\nसमय सिखाएगा उसे बहुत-सी चीजें\nहम तुम, नहीं।\nआज-कल में नहीं\nएक दो दिन में नहीं\nधीरे-धीरे जान पाएगा\nबुरे-भले के बारे में\nखरे-खोटे के बारे में\nउसे बड़ा आदमी नहीं\nभला आदमी बनाना\nवह सिक्कों की खनक न सुने हमेशा\nउसे अंधे को रास्ता पार कराने\nऔर कबूतर के घाव धोने का\nवक्त मिले हमेशा\nकिताबों में जो लिखा है उसे पढ़ाना\nउसे तारों और आकाशगंगाओं के बारे में भी\nजुगनुओं और केंचुओं और\nतितलियों की दुनिया में भी\nउसे कुछ देर ले जाना\nएलिस के आश्चर्यलोक में\nशेर की मांद में, मछलियों के अजब संसार में\nउसे कुछ देर भटकने देना\nफूलों वाली घाटी में\nहमेशा उसकी उंगली पकड़कर मत चलना\nभरे बाज़ार उसे अकेला भी छोड़ना\nतूफानी लहरों के विरुद्ध विपरीत दिशा में\nतैरना भी उसे सिखाना\nउसके घुटने छिल जाएँ तब भी\nपरवाह न करना।\nदूसरों पर नहीं अपने पर\nहँसना सिखाना उसे\nदूसरों को देखकर जलना नहीं\nअपने पर अफसोस करना\nअपने विश्वासों पर अडिग रहना\nपर बदलना जरूरत पड़ने पर उन्हें अगर उनकी कलई उतर गई हो\nभले लोगों को जीतना भलाई से\nकड़े लोगों को कड़ाई से\nपर पहले भलाई से\nभीड़ में वह शामिल न हो\nएक कोने में खड़ा होकर वह अपनी बारी की प्रतीक्षा करे\nभले ही प्रतीक्षा में बीत जाए सारा जीवन\nअन्याय के खिलाफ हाथ उठाने में वह आगे आए\nवह आवाजें ऊँची करें अपनी\nउनके लिए जिनकी आवाजें नहीं हैं\nचाटुकारों से वह सावधान रहे\nजो बहुत मीठे हैं उनसे वह बाज़ आए\nवह अपना शरीर और अपना ज्ञान\nदेश सेवा में लगाए\nपर कभी भी वह बेचे न अपनी\nआत्मा को चंद रुपयों की खातिर\nयह सब सिखाना उसे प्यार से मगर धीरे-धीरे\nपर पुचकार कर नहीं हमेशा\nआग में उसे तपाना\nतभी बनेगा वह इस्पात मज़बूत इतना\nयह सब करना होगा तुम्हें\nपर यह सब इतना आसान नहीं\nयह करना ही होगा तुम्हें मेरे दोस्त\nउसे भला इंसान अगर बनाना है!","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}