{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Makaan Ke Upari Manzil Par | Gulzar","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/0fcf478c\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":229,"description":"मकान की ऊपरी मंज़िल पर | गुलज़ार\n\nवो कमरे बंद हैं कब से\nजो चौबीस  सीढ़ियां जो उन तक पहुँचती थी, अब ऊपर नहीं जाती\n\nमकान की ऊपरी मंज़िल पर अब कोई नहीं रहता\nवहाँ कमरों में, इतना याद है मुझको\nखिलौने एक पुरानी टोकरी में भर के रखे थे\nबहुत से तो उठाने, फेंकने, रखने में चूरा हो गए\n\nवहाँ एक बालकनी भी थी, जहां एक बेंत का झूला लटकता था\nमेरा एक दोस्त था, तोता, वो रोज़ आता था\nउसको एक हरी मिर्ची खिलाता था\n\nउसी के सामने एक छत थी, जहाँ पर\nएक मोर बैठा आसमां पर रात भर\nमीठे सितारे चुगता रहता था\n\nमेरे बच्चों ने वो देखा नहीं,\nवो नीचे की मंजिल पे रहते हैं\nजहाँ पर पियानो रखा है, पुराने पारसी स्टाइल का\nफ्रेज़र से ख़रीदा था, मगर कुछ बेसुरी आवाज़ें  करता है\nकि उसकी रीड्स सारी हिल गयी हैं, सुरों के ऊपर दूसरे सुर चढ़ गए हैं\n\nउसी मंज़िल पे एक पुश्तैनी बैठक थी\nजहाँ पुरखों की तसवीरें लटकती थी\nमैं सीधा करता रहता था, हवा फिर टेढ़ा कर जाती\n\nबहु को मूछों वाले सारे पुरखे क्लीशे [Cliche] लगते थे\nमेरे बच्चों ने आख़िर उनको कीलों से उतारा, पुराने न्यूज़ पेपर में\nउन्हें महफूज़ कर के रख दिया था\nमेरा भांजा ले जाता है फिल्मो में\nकभी सेट पर लगाता है, किराया मिलता है उनसे\n\nमेरी मंज़िल पे मेरे सामने\nमेहमानखाना है, मेरे पोते कभी\nअमरीका से आये तो रुकते हैं\nअलग साइज़ में आते हैं वो जितनी बार आते\nहैं, ख़ुदा जाने वही आते हैं या\nहर बार कोई दूसरा आता है\n\nवो एक कमरा जो पीछे की तरफ़ बंद है,\nजहाँ बत्ती नहीं जलती, वहाँ एक\nरोज़री रखी है, वो उससे महकता है,\nवहां वो दाई रहती थी कि जिसने\nतीनों बच्चों को बड़ा करने में\nअपनी उम्र दे दी थी, मरी तो मैंने\nदफनाया नहीं, महफूज़ करके रख दिया उसको.\n\nऔर उसके बाद एक दो सीढ़ियाँ हैं,\nनीचे तहखाने में जाती हैं,\nजहाँ ख़ामोशी रौशन है, सुकून\nसोया हुआ है, बस इतनी सी पहलू में\nजगह रख कर, कि जब मैं सीढ़ियों\nसे नीचे आऊँ तो उसी के पहलू\nमें बाज़ू पे सर रख कर सो जाऊँ\n\nमकान की ऊपरी मंज़िल पर कोई नहीं रहता...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}