{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Desh Kagaz Par Bana Naksha Nahi Hota | Sarveshwar Dayal Saxena","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/1011e071\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":205,"description":"देश कागज़ पर बना नक्शा नहीं होता | सर्वेश्वरदयाल सक्सेना यदि तुम्हारे घर केएक कमरे में आग लगी होतो क्या तुमदूसरे कमरे में सो सकते हो?यदि तुम्हारे घर के एक कमरे मेंलाशें सड़ रहीं होंतो क्या तुमदूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?यदि हाँतो मुझे तुम सेकुछ नहीं कहना है।देश कागज़ पर बनानक़्शा नहीं होताकि एक हिस्से के फट जाने परबाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहेंऔर नदियां, पर्वत, शहर, गांववैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखेंअनमने रहें।यदि तुम यह नहीं मानतेतो मुझे तुम्हारे साथनहीं रहना है।इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ाकुछ भी नहीं हैन ईश्वरन ज्ञानन चुनावकागज़ पर लिखी कोई भी इबारतफाड़ी जा सकती हैऔर ज़मीन की सात परतों के भीतरगाड़ी जा सकती है।जो विवेकखड़ा हो लाशों को टेकवह अंधा हैजो शासनचल रहा हो बंदूक की नली सेहत्यारों का धंधा हैयदि तुम यह नहीं मानतेतो मुझेअब एक क्षण भीतुम्हें नहीं सहना है।याद रखोएक बच्चे की हत्याएक औरत की मौतएक आदमी कागोलियों से चिथड़ा तनकिसी शासन का ही नहींसम्पूर्ण राष्ट्र का है पतन।ऐसा खून बहकरधरती में जज़्ब नहीं होताआकाश में फहराते झंडों कोकाला करता है।जिस धरती परफ़ौजी बूटों के निशान होंऔर उन परलाशें गिर रही होंवह धरतीयदि तुम्हारे ख़ून मेंआग बन कर नहीं दौड़तीतो समझ लोतुम बंजर हो गये हो-तुम्हें यहां सांस लेने तक का नहीं है अधिकारतुम्हारे लिए नहीं रहा अब यह संसार।आखिरी बातबिल्कुल साफकिसी हत्यारे कोकभी मत करो माफचाहे हो वह तुम्हारा यारधर्म का ठेकेदार,चाहे लोकतंत्र कास्वनामधन्य पहरेदार।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}