{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Ek Rajnitik Pralap | Kumar Ambuj","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/1369c673\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":280,"description":"एक राजनीतिक प्रलाप।  कुमार अम्बुज \n\nयहाँ अब कुछ इच्छाओं का गुम हो जाना सबसे मामूली बात है।\nमसलन धुएँ के घेरे के बाहर एक जगह\nया एक ठहाका या एक किताब\nकबाड़ में ऐसी कई चीज़ें हैं जिन पर जंग और मायूसी है\nकबाड़ के बाहर भी ऐसी कई चीज़ें हैं जिन पर जम गई हैं उदासी की परतें\nमूर्त यातना जैसा कुछ नहीं\nबर्बरता एक वैधानिक कार्यवाही\nजिसके ज़रिये निबटा जा रहा है फालतू जनता से\nअखबार और हास्य धारावाहिकों के असंख्य चैनल हैं।\nकंप्यूटर पर खेल हैं नानाविध\nमेरे गाँव तक जाने का रास्ता बंद है अभी भी\nवर्षों पुरानी निर्माणाधीन पुलिया की प्रतीक्षा में\nउस पार करोड़ों लोग हैं जिनके जीवन से इधर कोई सरोकार नहीं\nजो लोग दुर्घटनाओं में मरे उनकी लाशें अभी सड़कों पर हैं\nशेर, शेर होने के जुर्म में मारे गए हैं।\nऔर सियार, सियार होने की वजह से\nनिर्दोष मारे गए उस गली में जहाँ वे अल्पसंख्यक\nयह एक बस्ती अभी-अभी उजड़ी है ज़हरीली शराब से\nमेरी माँ के पैर में पिछले नौ बरस से फोड़ा है\nहर गर्मी में फूट पड़ती है बेटे की नक़सीर\nऔर उपाय मेरी पहुँच से दस हज़ार मील दूर हैं \nउधर एक कवि कूद जाता है तेरहवीं मंज़िल से\n\nएक वह अलग था जिसे चौराहे पर पुलिस ने मार डाला था लाठियों से\nफिर भी करोड़ों लोग हैं जो जीवित रहने के रास्ते पर हैं\nमैं ख़ुद ज़हर नहीं खा पा रहा हूँ \nऔर ठीक-ठीक नहीं कह सकता कि यह एक आशा है\nकायरता है या साहस\n\nइतनी ज़्यादा  मुश्किलें हैं जिनमें जीवित हैं लोग\nकरोड़ों लोग गरीबी के नर्क में हैं\nकरोड़ों बच्चे झुलस रहे हैं फैक्ट्रियों में\nकरोड़ों स्त्रियाँ जर्जर शोकमय शरीरों में मुस्करा रही हैं\nअदृश्य सुखों की प्रतीक्षा में हाड़ तोड़ रहे हैं करोड़ों लोग\nजो भी मुश्किलें हैं वे करोड़ों की गिनती में हैं\nऔर नामुमकिन-सा ही है उनका बयान\nअभाव और बीमारी-हज़ारों लोहकूटों द्वारा कूट दिए गए शब्द हैं\nकरोड़ों ऐसे फ़ैसले लिए गए हैं हमारे वास्ते जिनमें हम शामिल नहीं\nलोग पसीज रहे हैं मगर दाँव पर कुछ नहीं लगा पा रहे\nजिन्हे दुःखों को पार करना था वे अब रह रहे हैं दुःखों के ही साथ\nअंत में मेरे पास फिर वही कुछ निराश शब्द बचे रहते हैं\nचमक-दमक और रईसी के बीच चमकते हैं करोड़ों पैबंद\nअनंत आश्वासनों के बीच मेरे पास कोई नारा नहीं है\nन मैं मारो-काटो-बचाओं कह सकता हूँ \nमैं ही क्या करोड़ों लोग हैं जो इतनी आपाधापी में हैं\nकि रोज़ी-रोटी के अलावा...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}