{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Labour Chowk | Shivam Chaubey","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/14e3a23c\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":238,"description":"लेबर चौक | शिवम चौबे\n\nकठरे  में सूरज ढोकर लाते हुए\nगमछे में कन्नी, खुरपी, छेनी, हथौड़ी बाँधे हुए\nरूखे-कटे हाथों से समय को धरकेलते हुए\nपुलिस चौकी और लाल चौक के ठीक बीच\nजहाँ रोज़ी के चार रास्ते खुलते है\nऔर कई बंद होते हैं\nजहाँ छतनाग से, अंदावा से, रामनाथपुर से\nजहाँ मुस्तरी या कुजाम से\nमुंगेर\nया आसाम से\nपूंजीवाद की आंत में अपनी ज़मीनों को पचता देख\nअगली सुबह\nग़रीबी की गद्दी पर बैठ विकास की ट्टही साईकिल पे सवार\nकई-कई मज़दूर आते हैं\nवहीं है लेबर चौराहा\nकई शहरों में कई-कई लेबर चौराहे हैं।\nअल्लापुर या रामबाग में\nबनारस या कानपुर में\nदिल्ली या अमृतसर में\nहर जगह जैसे सिविल लाइन्स है, जैसे घण्टाघर है, जैसे चौक है।\nवैसे ही लेबर चौराहा है\nइन जगहो से बहत अलग\nलेबर चौराहा ही है।\nजिसकी हथेली पे पूरा शहर टिका है\nआँखों से अभिजातपने की पट्टी हटाकर देखोगे तब समझोगे कि\nदुनिया के कोने-कोने में जहाँ-जहाँ मज़दूर हैं\nवहाँ -वहाँ भी होता ही है लेबर चौराहा\nफिर भी कितनी अजीब बात है।\nजिन रेलों से मज़दूर आते हैं।\nउनमें उनके डिब्बे सबसे कम है।\nजिन शहरों को बसाते हैं।\nउनमें उनके घर नगण्य है।\nजिन खेतों में अन्न उगाते हैं\nवहाँ उनकी भुख सबसे कम है\nखदानों में, मिलों में, स्कूलों में, बाज़ारों में, अस्पतालों में\nउनके हिस्से न के बराबर है\nफिर भी वे आते हैं अपना गाँव-टोला छीन लिए जाने के बाद\nजीने के लिए\nगंदे पानी, गंदी हवा और गंदी व्यवस्था में\nबचे रहने के लिए\nउसी विकास की टूटही साईकिल पे सवार उनहें जब भी लेबर चौराहे की तरफ आता\nहुआ देखो\nउन्हें पहचानो\nवे हमारे पड़ोस से ही आये हैं\nउनसे पूछो- \"का हाल बा\"\nवे जवाब ज़रूर देगे\nइज़राइल या फिलिस्तीन में\nभारत या ब्राज़ील में\nजहाँ दुनिया ढहेगी\nपहली ईट रखने वे ही आएंगे\nलेकिन सोचने वाली बात ये है।\nकि हर बार विकास की ट्टही साईकिल पे सवार\nगमछे में कन्नी, खुरपी, छेनी, हथौड़ी बाँधे हुए\nरूखे-कटे हाथों से समय को धकेलते\nहुए\nपुलिस चौकी और लाल चौक के ठीक बीच\nक्या वे इसी तरह आएंगे..?","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}