{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Kharab Television Par Pasandeeda Programme | Satyam Tiwari","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/1980c56f\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":180,"description":"ख़राब टेलीविज़न पर पसंदीदा प्रोग्राम देखते हुए | सत्यम तिवारी \n\nदीवारों पर उनके लिए कोई जगह न थी \nऔर नए का प्रदर्शन भी आवश्यक था\n इस तरह वे बिल्लियों के रास्ते में आए \nऔर वहाँ से हटने को तैयार न हुए \nयहीं से उनकी दुर्गति शुरू हुई \nउनका सुसज्जित थोबड़ा बिना ईमान के डर से बिगड़ गया \nअपने आधे चेहरे से आदेशवत हँसते हुए \nवे बिल्कुल उस शोकाकुल परिवार की तरह लगते \nजिनके घर कोई नेता खेद व्यक्त करने पहुँच जाता है \nबाक़ी बचे आधे में वे कुछ कुछ रुकते फिर दरक जाते \nजब हम उन्हें देख रहे होते हैं \nवे किसे देख रहे होते हैं\n ये सचमुच देखे जाने का विषय है \nक्या सात बजकर तीस मिनट पर \nएक अधपकी कच्ची नींद लेते हुए \nउन्हें अचानक याद आता होगा\n कि यह उनके पसंदीदा प्रोग्राम का वक़्त है\n या हर रविवार दोपहर बारह के आस-पास \nप्रसारित होती हुई कोई फ़ीचर फ़िल्म या कार्यक्रम चित्रहार देख कर \nउनकी ज़िन्दगी रिवाइंड होती होगी \nमसलन कॉलेज के दिनों में सुने हुए गीतों की याद \nया गीत गाते हुए खाई गई क़समों की कसक \nटीन के डब्बे नहीं हैं टेलीविजन \nफिर भी उन्होंने वही चाहा जो घड़ियाँ चाहती रही हैं इतने दिनों तक \nघड़ी दो घड़ी दिखना भर \nयानी कोई उन्हें देखे सिर्फ़ देखने के मक़सद से \nजिसे हम मज़ाक़ मज़ाक़ में टीवी देखना कह देते हैं \nजब बिजली गुल हो \nउस वक़्त उन्हें देखने से शायद कुछ ऐसा दिख जाए \nजो तब नहीं दिखता जब टीवी देखना छोड़ कर\n लोग तमाशा देखने लग जाते हैं जो टीवी पर आता है","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}