{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Utni Door Mat Byahna Baba - Nirmala Putul","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/1a456c9c\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":335,"description":" उतनी दूर मत ब्याहना - निर्मला पुतुल \n\nनिर्मला पुतुल हिंदी और संताली भाषा की बहुचर्चित लेखिका व कवयित्री हैं। उनका काव्य-संसार आदिवासी महिलाओं के मानवाधिकार, लैंगिक भेदभाव, उत्पीड़न और पलायन जैसे ज़रूरी मुद्दों की आवाज़ बना। निर्मला जी एक सोशल एक्टिविस्ट भी हैं और दलित, आदिवासी महिलाओं की शिक्षा एवं जागरुकता हेतु प्रयासरत रही हैं। \nबाबा!\nमुझे उतनी दूर मत ब्याहना\nजहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर\nघर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हें\nमत ब्याहना उस देश में\nजहाँ आदमी से ज़्यादा\nईश्वर बसते हों\nजंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँ\nवहाँ मत कर आना मेरा लगन\nवहाँ तो क़तई नहीं\nजहाँ की सड़कों पर\nमन से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों मोटरगाड़ियाँ\nऊँचे-ऊँचे मकान और\nबड़ी-बड़ी दुकानें\nउस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता\nजिस में बड़ा-सा खुला आँगन न हो\nमुर्ग़े की बाँग पर होती नहीं हो जहाँ सुबह\nऔर शाम पिछवाड़े से जहाँ\nपहाड़ी पर डूबता सूरज न दिखे\nमत चुनना ऐसा वर\nजो पोचई और हड़िया में डूबा रहता हो अक्सर\nकाहिल-निकम्मा हो\nमाहिर हो मेले से लड़कियाँ उड़ा ले जाने में\nऐसा वर मत चुनना मेरी ख़ातिर\nकोई थारी-लोटा तो नहीं\nकि बाद में जब चाहूँगी बदल लूँगी\nअच्छा-ख़राब होने पर\nजो बात-बात में\nबात करे लाठी-डंडा की\nनिकाले तीर-धनुष, कुल्हाड़ी\nजब चाहे चला जाए बंगाल, असम या कश्मीर\nऐसा वर नहीं चाहिए हमें\nऔर उसके हाथ में मत देना मेरा हाथ\nजिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाए\nफ़सलें नहीं उगाईं जिन हाथों ने\nजिन हाथों ने दिया नहीं कभी किसी का साथ\nकिसी का बोझ नहीं उठाया\nऔर तो और!\nजो हाथ लिखना नहीं जानता हो ‘ह’ से हाथ\nउसके हाथ मत देना कभी मेरा हाथ!\nब्याहना हो तो वहाँ ब्याहना\nजहाँ सुबह जाकर\nशाम तक लौट सको पैदल\nमैं जो कभी दुख में रोऊँ इस घाट\nतो उस घाट नदी में स्नान करते तुम\nसुनकर आ सको मेरा करुण विलाप\nमहुआ की लट और\nखजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ संदेश तुम्हारी ख़ातिर\nउधर से आते-जाते किसी के हाथ\nभेज सकूँ कद्दू-कोहड़ा, खेखसा, बरबट्टी\nसमय-समय पर गोगो के लिए भी\nमेला-हाट-बाज़ार आते-जाते\nमिल सके कोई अपना जो\nबता सके घर-गाँव का हाल-चाल\nचितकबरी गैया के बियाने की ख़बर\nदे सके जो कोई उधर से गुज़रते\nऐसी जगह मुझे ब्याहना!\nउस देश में ब्याहना\nजहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते हों\nबकरी और शेर\nएक घाट पानी पीते हों जहाँ\nवहीं ब्याहना मुझे!\nउसी के संग ब्याहना जो\nकबूतर के...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}