{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Sankhyaein | Naresh Saxena","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/1c964873\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":209,"description":"संख्याएँ - नरेश सक्सेना\nशब्द तो आए बहुत बाद में\nसँख्याएँ हमारे साथ जन्म से ही हैं\nगर्भ में जब\nनिर्माण हो रहा था हमारी हड्डियों का\nरक्तकणों और कोशिकाओं का\nसाथ-साथ सँख्याएँ भी निर्मित होती जा रही थीं\nएक हमारी देह की इकाई की वो सँख्या है\nजिसमें समाहित हैं सारी सँख्याएँ\nदो आँखों में स्थित है दो\nतीन है उँगलियों के तीन जड़ों में\nहृदय के हिस्से हैं चार\nऔर पाँच का निवास\nपाँच उँगलियों में है\nआगे की सारी सँख्याओं को\nदेह में तलाशना बहुत मज़ेदार खेल है\nनौ को तो अमर कर गए कबीर\nकि नौ द्वारे का पिंजरा ता में पंछी पौन...\nमुझे तो बहुत चकित करती है यह बात\nकि देह की सँख्याएँ आठ की सँख्या निर्धारित करती हैं\nक्योंकि आठ तरह से ही मुड़ती है यह देह\nइसीलिए तो कृष्ण कहलाते हैं अष्टावक्र\nसात रंग दीखते हैं आँखों को\nऔर जीभ छह तरह के स्वादों को पहचानती है\nइसीलिए तो भोजन को कहा गया षट्‍रस\nदेखिए एक से बना कैसा प्यारा शब्द\nएका\nएक जो दूसरे के बिना रह नहीं सकता\nजिसके बिना सम्भव नहीं थी\nइस दुनिया की शुरुआत\nमैंने तो शुरू में ही कही थी यह बात\nकि सँख्याएँ शब्दों की पूर्वज हैं\nशब्द तो आए बहुत बाद में\nऔर आते ही चले जा रहे हैं\nजबकी सँख्याएँ सबकी सब आ चुकी हैं\nक्या कोई नई सँख्या बता सकते हैं आप ।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}