{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Padhna Mere Pair | Jyoti Pandey","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/1e81a763\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":167,"description":"पढ़ना मेरे पैर | ज्योति पांडेय\n\nमैं गई \nजबकि मुझे नहीं जाना था। \nबार-बार, कई बार गई। \nकई एक मुहानों तक \nन चाहते हुए भी… \nमेरे पैर मुझसे असहमत हैं, \nनाराज़ भी। \nकल्पनाओं की इतनी यात्राएँ की हैं \nकि अगर कभी तुम देखो \nतो पाओगे कि कितने थके हैं ये पाँव! \nजंगल की मिट्टी, पहाड़ों की घास और समंदर की रेत से भरी हैं बिवाइयाँ। \nनाख़ूनों पर पुत गया है-\nहरा-नीला मटमैला सब रंग; \nकोई भी नेलकलर लगाऊँ \nदो दिन से ज़्यादा टिकता नहीं। \nतुमने कभी देखे हैं क्या \nसोच के ठिकाने? \nमेरे पाँव पूछते हैं मुझसे \nकब थमेगी तुम्हारी दौड़? \nमैं बता नहीं पाती, क्योंकि, जानती नहीं! \nतुम कभी मिलना इनसे \nएकांत में-\nजब मैं भी न होऊँ। \nये सुनाएँगे तुम्हें \nकई वे क़िस्से और बातें \nजो शायद अब हम तुम कभी बैठकर न कर पाएँ! \nजब मैं न रहूँ \nतुम पढ़ना मेरे पैर, \nवहाँ मैं लिख जाऊँगी \nसारी वर्जनाओं की स्वीकृति; \nठीक उसी क्षण \nमेरे पैर भी मेरे भार से मुक्त होंगे! ","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}