{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Chote Chote Ishwar | Madan Kashyap","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/202176bc\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":332,"description":"छोटे-छोटे ईश्वर | मदन कश्यप\nछोटे-छोटे ईश्वर\n\nछोटे-छोटे मंदिरों में रहते हैं\nछोटे-छोटे ईश्वर\n\nविशाल ऐतिहासिक मंदिरों की भीतरी चारदीवारियों कोनों-अंतरों में\n\nबने नक्काशीदार आलों ताकों कोटरों में \nदुबके बैठे इन ईश्वरों का अपना कोई साम्राज्य नहीं होता \nये तो महान ईश्वरतंत्र के बस छोटे-छोटे पुर्जे होते हैं \nकिसी-किसी की बड़े ईश्वर से कुछ नाते-रिश्तेदारी भी होती है \nऔर महात्म्य- कथाओं में इस बारे में लिखे होते हैं एक-दो वाक्य\n\nइनके पुजारी इन्हीं जैसे दीन-हीन होते हैं \nउनकी न तो फैली हुई तोंद होती है ना ही गालों पर लाली \nवे रेशम और साटन के महँगे रंगीन कपड़े नहीं पहनते \nबस हैंडलूम की एक मटमैली धोती को बीच से फाड़कर \nआधा पहन लेते हैं आधा ओढ़ लेते हैं \nउनके त्रिपुंड में भी वह आक्रामक चमक नहीं होती\n\nबड़े ईश्वर के महान मंदिर की परिक्रमा कर रहे लोगों को\nपुकार-पुकार कर बुलाता है छोटा पुजारी \nअपने ईश्वर का उनसे नाता-रिश्ता बतलाता है\n\nइक्का-दुक्का कोई छिटककर पास आ गया तो\nझट से हाथ में जल-अक्षत देकर संकल्प करा देता है \nफिर ग्यारह सौ आशीर्वादों के बाद माँगता है ग्यारह रुपये की दक्षिणा  \nइससे अधिक कुछ माँगने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है छोटा पुजारी \nवैसे मिलने को सवा रुपया भी मिल जाए तो संतोष कर लेता है\n\nलगभग अप्रचलित हो चुकी छोटी रेजगारियाँ \nइन छोटे ईश्वरों पर ही चढ़ती हैं \nएक बहुत ही छोटी और अविश्वसनीय कमाई पर पलते हैं \nइन छोटे-छोटे पुजारियों के कुनबे \nकई बार तो ऐसे गिड़गिड़ाता है छोटा पुजारी \nकि पता नहीं चलता दक्षिणा माँग रहा है या भीख\n\nसबसे छोटे और दयनीय होते हैं \nउजाड़ में नंगी पहाड़ियों पर या मलिन बस्तियों के निकट \nढहते-ढनमनाते मंदिरों के वे ईश्वर\n\nजिनके होने की कोई कथा नहीं होती \nउनके तो पुजारी तक नहीं होते \nरोटी की तलाश में किसी शहर को भाग चुका होता है \nपुजारी का कुनबा \nअपने ईश्वर को अकेला असहाय छोड़कर\n\nअपनी देह की धूल तक झाड़ नहीं पाता है अकेला ईश्वर \nवह तो भूलने लगता है अपना वजूद \nतभी छठे-छमाहे आ जाता है कोई राहगीर\n\nकुएँ के जल से धोता है उसकी देह \nमंदिर की सफाई करके जलाता है दीया \nइस तरह ईश्वर को उसके होने का एहसास कराता है \nतब ईश्वर को लगता है कि ईश्वर की कृपा से यह सब हुआ\n\nकभी-कभी तो शहरों के भीड़-भाड़ वाले व्यस्त चौराहों पर \nअट्टालिकाओं में दुबके मंदिरनुमा ढाँचों में ...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}