{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Padhakku Ka Soojh | Ramdhari Singh 'Dinkar'","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/21c51017\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":162,"description":"पढ़क्‍कू की सूझ | रामधारी सिंह \"दिनकर\"\n\nएक पढ़क्कू बड़े तेज थे, तर्कशास्त्र पढ़ते थे,\nजहाँ न कोई बात, वहाँ भी नए बात गढ़ते थे।\n\nएक रोज़ वे पड़े फिक्र में समझ नहीं कुछ न पाए,\n\"बैल घुमता है कोल्हू में कैसे बिना चलाए?\"\n\nकई दिनों तक रहे सोचते, मालिक बड़ा गज़ब है?\nसिखा बैल को रक्खा इसने, निश्चय कोई ढब है।\n\nआखिर, एक रोज़ मालिक से पूछा उसने ऐसे,\n\"अजी, बिना देखे, लेते तुम जान भेद यह कैसे?\n\nकोल्हू का यह बैल तुम्हारा चलता या अड़ता है?\nरहता है घूमता, खड़ा हो या पागुर करता है?\"\n\nमालिक ने यह कहा, \"अजी, इसमें क्या बात बड़ी है?\nनहीं देखते क्या, गर्दन में घंटी एक पड़ी है?\n\nजब तक यह बजती रहती है, मैं न फिक्र करता हूँ,\nहाँ, जब बजती नहीं, दौड़कर तनिक पूँछ धरता हूँ\"\n\nकहा पढ़क्कू ने सुनकर, \"तुम रहे सदा के कोरे!\nबेवकूफ! मंतिख की बातें समझ सकोगे थोड़े!\n\nअगर किसी दिन बैल तुम्हारा सोच-समझ अड़ जाए,\nचले नहीं, बस, खड़ा-खड़ा गर्दन को खूब हिलाए।\n\nघंटी टून-टून खूब बजेगी, तुम न पास आओगे,\nमगर बूँद भर तेल साँझ तक भी क्या तुम पाओगे?\n\nमालिक थोड़ा हँसा और बोला पढ़क्कू जाओ,\nसीखा है यह ज्ञान जहाँ पर, वहीं इसे फैलाओ।\n\nयहाँ सभी कुछ ठीक-ठीक है, यह केवल माया है,\nबैल हमारा नहीं अभी तक मंतिख पढ़ पाया है।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}