{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Nadi Kabhi Nahi Sookhti | Damodar Khadse","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/24086201\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":211,"description":"नदी कभी नहीं सूखती | दामोदर खड़से \n\nपौ फटने से पहले\nसारी बस्ती ही\nगागर भर-भरकर\nअपनी प्यास\nबुझाती रही\nफिर भी\nनदी कुँवारी ही रही\nक्योंकि,\nनदी कभी नहीं सूखती \nनदी, इस बस्ती की पूर्वज है!\n\nपीढ़ियों के पुरखे\nइसी नदी में\nडुबकियाँ लगाकर\nअपना यौवन\nजगाते रहे\nसूर्योदय से पहले\nसतह पर उभरे कोहरे में\nअंजुरी भर अनिष्ट अँधेरा\nनदी में बहाते रहे\nहर शाम\nबस्ती की स्त्रियाँ\nअपनी मन्नतों के दीये\nइसी नदी में सिराती रहीं\nनदी बड़ी रोमांचित, \nबड़ी गर्वीली हो\nअपने भीतर\nसब कुछ समेट लेती\nहरियाली भरे\nउसके किनारे\nउगाते रहे निरंतर वरदान \nकभी-कभी असमय छितराए \nप्राणों के,\nफूलों के स्पर्श\nनदी को भावुक कर जाते \nपर नदी बहती रही\nउसकी आत्मा हमेशा ही \nधरती रही\nबस्ती के हर छोर को\nनदी का प्यार मिलता रहा \nसुख-दुख की गवाह रही नदी...\n\nकुछ दिनों से बस्ती में\nआस्थाओं और विश्वासों पर\nबहस जारी है\nकभी-कभी नदी\nचारों ओर से \nअकेली हो जाती है\nनदी को हर शाम\nइंतजार रहता दीपों का\nकोई कहता\nनदी सूख रही है\nभीतर से\nसुनकर यह\nपिघलता है हिमालय\nऔर नदी में\nबाढ़ आ जाती है फिर\nउसकी बूँदें नर्तन\nऔर उसका संगीत\nबहाव पा जाता है\nकिनारे गीत गाते हैं\nगागर भर-भर ले जाती हैं बस्तियाँ \nनदी कभी नहीं सूखती!","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}