{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Pita Ke Shraadh Par | Ajay Jugran","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/2504678d\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":161,"description":"पिता के श्राद्ध पर | अजेय जुगरान\n\nहम कान लगाए बैठे हैं \nलगता है अभी आवाज़ देंगे \nलेकिन नहीं, वो हैं ही नहीं ।\n\nमस्तिष्क पर आघात से पहले \nवे पूर्णतः आत्मनिर्भर थे \nया यूँ कहें केवल अम्मा पर निर्भर थे ।\n\nहमसे कभी कुछ माँगा ही नहीं \nकेवल ताश, शतरंज या कैरम \nखेलने का साथ छोड़ ।\n\nउसके बाद उनकी आखें बोलने लगीं \nऔर जब तक वो जिंदा थे \nतब तक हम उन्हें पढ़ मददगार साक्षी रहे बने \nउनके लिए टीवी लगाकर \nउनके कमरे से आते जाते\nहाल चाल पूछ \nउनका तकिया, बिस्तर, दवा, पानी ठीक कर \nउनके जूते चप्पल टोपी छड़ी सीधे कर \nहम फिर अपने कामों में व्यस्त \nउनकी पहले से मीठी \nऔर आघात से क्षीण हुई आवाज़ को\n\nतब तक न सुन पाते \nजब तक वो झल्ला के हमें डाँट न देते \nअपनी खोई ताक़त खोजते क्षणिक गुस्से में \nजिसके बाद जो हमसे अनसुना हुआ होता \nअम्मा उनका हाव भाव देख उसका अनुवाद करतीं \nऔर हम वह सब चुपचाप करते, उससे थोड़ा ज़्यादा ही ।\n\nलेकिन अब जब वो हैं नहीं \nहम कान लगाए बैठे हैं \nदिल चाहता है वो आवाज़ दें \nलेकिन नहीं, वो हैं ही नहीं ।\n\nअब वो न्यायाधीश हैं \nऔर हम तरसते हैं उनकी \nकोमल डाँट के आशीर्वाद को \nजो वो अब दंडस्वरूप लगाते ही नहीं । \nहम कान लगाए बैठे हैं लेकिन अब वो बस \nपूजा से झाँकते भर हैं इक शांत मुस्कान लिए \nमाथे तिलक लगी तस्वीर से ।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}