{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Parcham | Kumar Ambuj","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/2546e3ea\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":166,"description":"परचम।  कुमार अम्बुज \n\nवहाँ एक फूल खिला हुआ है अकेला \nकोई उसे छू भी नहीं रहा है \nकिसी सुबह शाम में वह झर जाएगा \nलेकिन देखो, वह खिला हुआ है\n\nबारिश, धूल और यातनाओं को और ऋतुओं को  जज़्ब करते हुए \nएक पत्थर भी है वहाँ किसी की प्रतीक्षा में \nआसपास की हर चीज़ इशारा करती है \nतालाब किनारे अँधेरी झाड़ियों में चमकते हैं जुगनू \nदुर्दिनों के किनारे शब्द\n\nमुझे प्यास लग आयी है और यह सपना नहीं है \nजैसे पेड़ की यह छाँह मंज़िल नहीं \nयह समाज जो आख़िर एक दिन आज़ाद होगा \nउसकी संभावना मरते हए आदमी की आँखों में है \nऔर असफलता मृत्यु नहीं है \n\nयह जीवन है, धोखेबाज़ पर भी मुझे विश्वास करना होगा \nनिराशाएँ अपनी गतिशीलता में आशाएँ हैं\n\n'मैं रोज़ परास्त होता हूँ'-\nइस बात के कम से कम बीस अर्थ हैं\nयों भी एक-दो अर्थ देकर \nटिप्पणीकार काफ़ी कुछ नक़सान पहुँचा चुके हैं \nगणनाएँ असंख्य को संख्या में न्यून करती चली जाती हैं\n\nसतह पर जो चमकता है वह परावर्तन है\nउसके नीचे कितना कुछ है अपार \nशांत, चपल और भविष्य से लबालब भरा हुआ।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}