{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Ityaadi | Rajesh Joshi","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/28861aeb\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":175,"description":"इत्यादि - राजेश जोशी\n\nकुछ लोगों के नामो का उल्लेख किया गया था जिनके ओहदे थे\nबाकी सब इत्यादि थे\nइत्यादि तादात में हमेशा ही ज़्यादा होते थे\nइत्यादि भाव ताव कर के सब्जी खरीदते थे और खाना वाना खा कर\nख़ास लोगों के भाषण सुनने जाते थे\nइत्यादि हर गोष्ठी में उपस्थिति बढ़ाते थे\nइत्यादि जुलूस में जाते थे तख्तियां उठाते थे नारे लगाते थे\nइत्यादि लम्बी लाइनों में लग कर मतदान करते थे\nउन्हें लगातार ऐसा भ्रम दिया गया था कि वो ही\nइस लोकतंत्र में सरकार बनाते थे\nइत्यादि हमेशा ही आन्दोलनों में शामिल होते थे\nइसलिए कभी कभी पुलिस की गोली से मार दिए जाते थे।\nजब वे पुलिस की गोली से मार दिए जाते थे\nतब उनके वो नाम भी हमें बतलाये जाते थे\nजो स्कूल में भरती करवाते समय रखे गए थे\nया जिससे उनमे से कुछ पगार पाते थे\nकुछ तो ऐसी दुर्घटना में भी इत्यादि रह जाते थे।\nइत्यादि यूँ तो हर जोखिम से डरते थे\nलेकिन कभी - कभी जब वो डरना छोड़ देते थे\nतो बाकी सब उनसे डरने लगते थे।\nइत्यादि ही करने को वो सारे काम करते थे\nजिनसे देश और दुनिया चलती थी\nहालाँकि उन्हें ऐसा लगता था कि वो ये सारे काम\nसिर्फ़ अपना परिवार चलाने को करते हैं\nइत्यादि हर जगह शामिल थे पर उनके नाम कहीं भी\nशामिल नहीं हो पाते थे।\nइत्यादि बस कुछ सिरफिरे कवियों की कविता में\nअक्सर दिख जाते थे।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}