{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Happily Ever After | Satyam Tiwari","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/2a4f1f6f\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":161,"description":"हैप्पिली एवर आफ्टर । सत्यम तिवारी\n\nहम चाहते थे अंत में नायक ही विजयी हो\nलेकिन जो विजयी हुआ\n\nउन्होंने उसे ही नायक घोषित कर दिया\nअबकी बार भी सिनेमा में\n\nसमय से अधिक, पैसों की बर्बादी खली\nवही हुआ फिर उन्होंने अपना नायक\n\nपहले से चुन रखा था\nकहानी जो चाहे रुख़ ले\n\nऊँट किसी भी करवट बैठे\nराजगद्दी पर उनका ही नायक बैठेगा\n\nनायिका भी उसी के हिस्से आएगी\nदिलों में प्यार उमड़ेगा बस उसके ही लिए\n\nऔर हमारा हीरो, ठीक हमारी तरह\nसिनेमा में नंगा, एक नंबर का लफ़ंगा\n\nमरकर अमर होने का उसका सपना\nबेहतर चरित्र निर्माण की तरह\n\nइस बार भी अधूरा रह गया\nअव्वल तो उसे अपना हाथ\n\nअपनी जेब में रखना था\nऔर एक सुस्त, उबाऊ संगीत के मद्देनज़र\n\nसड़कों पर, ख़ासकर मद्धिम रौशनी में\nएक तयशुदा चाल, धीमे-धीमे चलनी थी\n\nआख़िर वह हमारा हीरो था\nकोई गली का लफ़ंगा नहीं\n\nअगर होता जो\nतेज़-तेज़ क़दमों से चलता\n\nफ़िल्म से कब का बाहर निकल जाता\nलेकिन वह जानता है\n\nलाख इंटरवल बदलकर भी\nवह फ़िल्म का क्लाइमेक्स नहीं बदल सकता\n\nबेहतर तो यही होता\nदर्शक ऐसा कोई भी अंत\n\nमानने से इनकार कर देते\nजो उनकी असल ज़िंदगी के\n\nविरोधाभास में है।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}