{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Dono Oar Prem Palta Hai | Maithilisharan Gupt","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/2a6c8703\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":165,"description":"दोनों ओर प्रेम पलता है।  मैथिलीशरण गुप्त \nदोनों ओर प्रेम पलता है।सखि, पतंग भी जलता हैहां! दीपक भी जलता है।\nसीस हिलाकर दीपक कहता - ’बन्धु वृथा ही तू क्यों दहता?’पर पतंग पड़ कर ही रहताकितनी विह्वलता हैदोनों ओर प्रेम पलता है।\nबचकर हाय! पतंग मरे क्या?प्रणय छोड़ कर प्राण धरे क्या?जले नहीं तो मरा करे क्या?क्या यह असफ़लता है? दोनों ओर प्रेम पलता है।\nकहता है पतंग मन मारे- ’तुम महान, मैं लघु, पर प्यारे,क्या न मरण भी हाथ हमारे?शरण किसे छलता है?’दोनों ओर प्रेम पलता है।\nदीपक के जलने में आली,फिर भी है जीवन की लाली।किन्तु पतंग-भाग्य-लिपि काली,किसका वश चलता है?दोनों ओर प्रेम पलता है।\nजगती वणिग्वृत्ति है रखती,उसे चाहती जिससे चखती;काम नहीं, परिणाम निरखती।मुझको ही खलता है।दोनों ओर प्रेम पलता है।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}