{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Sheetleheri Mein Ek Boodhe Aadmi Ki Prathna | Kedarnath Singh","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/2b8b1fe9\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":170,"description":"शीतलहरी में एक बूढ़े आदमी की प्रार्थना | केदारनाथ सिंहईश्वरइस भयानक ठंड में जहाँ पेड़ के पत्ते तक ठिठुर रहे हैं मुझे कहाँ मिलेगा वह कोयला जिस पर इन्सानियत का खून गरमाया जाता है एक ज़िन्दा लाल दहकता हुआ कोयला मेरी अँगीठी के लिए बेहद ज़रूरी और हमदर्द कोयला मुझे कहाँ मिलेगा इस ठंड से अकड़े हुए शहर में जहाँ वह हमेशा छिपाकर रखा जाता है घर के पिछवाड़े या ग़ुसलख़ाने की बग़ल में हथेलियों की रगड़ में दबा रहता है जो जो इरादों में होता है जो यकायक सुलग उठता है याददाश्त की हदों पर पस्ती के दिनों में मुझे कहाँ मिलेगा वह कोयला मेरे ईश्वर! मुझे क्या करना चाहिए इस दिन काजिसमें कोयला नहीं है मुझे क्या करना चाहिए इस ठंड का जो बराबर बढ़ती जा रही है क्या मैं भी इन्तज़ार करूँ ​​जैसे सब कर रहे हैंक्या मैं उदूँ और अपने-आपको बदल लूँएक कोयला झोंकनेवाले बेलचे मेंक्या मैं बाज़ार जाऊँऔर अपनी आत्मा के लिए ख़रीद लूँएक अच्छा-सा कनटोप?मेरे ईश्वर!क्या मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकतेकि इस ठंड से अकड़े हुए शहर को बदल दोएक जलती हुई बोरसी में!बोरसी = अंगीठी ; मिट्टी का बरतन जिसमें आग रखकर जलाते हैं","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}