{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Kaka Se | Ashok Vajpeyi","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/2bda6e20\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":165,"description":"काका से | अशोक वाजपेयी | अशोक वाजपेयीअब जब हमारे बीच कुछ और नहीं बचा हैथोड़े से दु:ख और पछतावे के सिवायऔर हम भूल चुके हैं तुम्हारे गुस्से और विफलताओं कोमेरे बारे में तुम्हारी आशंकाओं को,हम देख सकते हैं कि जीवन में आभिजात्य तो आ जाता है,गरिमा आती है बड़ी मुश्किल सेजीवन गरिमा देने में बहुत कंजूस हैहम दोनों को ऐसी गरिमा पा सकने का उबालता रहा है।कोई भी अपमान फिर वह देवताओं ने किया होया दुष्टों ने हम भूल नहीं पाएजबकि जीने की झंझट में ऐसा भूलनास्वाभाविक और ज़रूरी होताहमें विफलता के बजाय अपमान क्योंअधिक स्मरणीय लगाये हो सकता है एक पारिवारिक दोष होएक किसान बेटे के स्वाभिमान काएक छोटे शहर के कल की आत्मवंचना कातुम्हें गये पैंतीस बरस हो गएऔर मैं तुम्हारी उमर से कहीं ज्यादाउमर का होकर, अभी बूढ़ा रहा हूँतुम्हारे पास मुझे समझने की फ़ुरसत नहीं थीऔर मैं तुम्हें रखने में हमेशा ढील रहाअब जब हमारे बीच थोड़ा-सा दु:ख और पक्षतावा भरबचा है, कुछ पथारे को तुम देख पातेतो तुम्हें लगता, मैंने अपनी जिद पर अड़े रह करऔर अपमान को न भूल कर तुम्हें ही दोहराया हैअसली दु:ख ये नहीं है कि इतने बरस नासमझी में गुज़र गएबल्कि ये अंतत: मैं तुम्हारी फीकी आवृति हूँइसकी तुम्हें या मुझे कभी कोई आशंका या इच्छा नहीं।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}