{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Anubhav | Nilesh Raghuvanshi","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/2e666d66\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":189,"description":"अनुभव | नीलेश रघुवंशी \n\nतो चलूँ मैं अनुभवों की पोटली पीठ पर लादकर बनने लेखक\nलेकिन  मैंने कभी कोई युद्ध नहीं देखा\nखदेड़ा नहीं गया कभी मुझे अपनी जगह से\nनहीं थर्राया घर कभी झटकों से भूकंप के\nपानी आया जीवन में घड़ा और बारिश बनकर\nविपदा बनकर कभी नहीं आई बारिश\nदंगों में नहीं खोया कुछ भी न खुद को न अपनों को\nकिसी के काम न आया कैसा हलका जीवन है मेरा\nतिस पर \nमुझे कागज़ की पुड़िया बाँधना नहीं आता \nलाख कोशिश करूँ सावधानी बरतूँ खुल ही जाती है पुड़िया\nपुड़िया चाहे सुपारी की हो या हो जलेबी की\nनहीं बँधती तो नहीं बँधती मुझसे कागज़ की पुड़िया नहीं सधती\nअगर मैं  लकड़हारा  होती तो कितने करीब होती जंगल के\nहोती मछुआरा तो समुद्र मेरे आलिंगन में होता\nअगर अभिनय आता होता मुझे तो एक जीवन में जीती कितने जीवन\nजीवन में मलाल न होता राजकुमारी होती तो कैसी होती\nऔर तो और अगले ही दिन लकड़हारिन बनकर घर-घर लकड़ी पहुँचाती\nअगर मैं जादूगर होती तो\nपल-भर में गायब कर देती सिंहासन पर विराजे महाराजा दुःख को\nसचमुच कंचों की तरह चमका देती हर एक का जीवन\nसोचती बहुत हूँ लेकिन कर कुछ नहीं पाती हूँ \nमेरा जीवन न इस पार का है न उस पार का\nतो कैसे निकलूं मैं \nअनुभवों की पोटली पीठ पर लादकर बनने लेखक ?","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}