{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Abbas Miyan | Neerav","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/31d37b27\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":196,"description":"अब्बास मियाँ | नीरव \n\nपंद्रह बीघे की खेती अकेले संभालने वाले अब्बास मियाँ \nहमारे हरवाहे थे\nहम काका कहते थे उन्हें\nहम सुनते बड़े हुए थे काका खानदानी\nशहनाई वादक थे\nअपने ज़माने में बहुत मशहूर\nदूर-दूर तक उनके सुरों की गूंज थी\nहमारे बाबा भी एक क़िस्सा बताते थे\nकाशी में काका को एक दफे उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के सामने\nशहनाई बजाने का मौका मिला था\nऔर उस्ताद ने पीठ थपथपाकर कहा था -\nउसकी बड़ी नेमत है हुनर\nसंभालना\nउसकी नेमत जितनी बड़ी थी\nउससे बड़ी थी उनकी घर-गृहस्थी\nऔर घर गृहस्थी से भी बड़ी थी उनकी पुश्तैनी दरिद्रता\nसो उन्हें रखनी पड़ी अपनी जान से भी प्रिय\nशहनाई\nऔर करनी पड़ी हरवाही\nबाद उसके कछ पुराने शौकिया लोग बुलाते रहे शादी-ब्याह  में\nकाका को\nशहनाई बजवाने\nपर एक वक्त के बाद सहालग भी छट गया\nहम छोटे थे तब इतना नहीं समझते थे\nलेकिन काका जब कहते\nहमारे साथ ही हमारा ये खानदानी हुनर बिला जाएगा\nतब हम भी उनकी तरह मलाल के किसी अंधेरे में खो जाते थे\nअच्छे से याद है बाबा का जब देहांत हुआ था \nकाका ने उठाई थी शहनाई\nऔर माटी जब उठी तब छेड़ा था राग\nफिर क्या परिचित क्या अपरिचित\nसबके रूदन को समेट लिया था उन्होंने अपनी शहनाई में\nबादल भी बरसे थे बाबा की शवयात्रा में\nसबसे बड़ी थी उसकी नेमत\nलेकिन उससे भी बड़ा था कुछ\nऐसी विदाई जिसमें सबकी आँख से पानी बरस रहा था\nकाका बजा रहे थे\nन जाने कौनसा दुख","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}