{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Tirohit Sitar | Damodar Khadse","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/3229315f\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":219,"description":"तिरोहित सितार | दामोदर खड़सेखूँखार समय केघनघोर जंगल में बहरा एकांत जब देख नहीं पाता अपना आसपास...तब अगली पीढ़ी की देहरी पर कोई तिरोहित सितार अपने विसर्जन की कातर याचना करती है यादों पर चढ़ी धूल हटाने वाला कोई भी तो नहीं होता तब जब आँसू दस्तक देते हैं–बेहिसाब!मकान छोटा होता जाता हैऔर सितार ढकेल दी जाती है कूड़े में आदमी की तरह...सितार के अंतर मेंअमिट प्रतिबिंबबार-बारउन अँगुलियों की याद करते हैंजिन्होंने उसेसँवारते हुएपोर-पोर मेंअलख जगाई थी और आँख भरतृप्ति पाई थी...स्थितियाँ बड़ी चुगलखोर और ईर्ष्यालुतैश में आकर वेविरागी सितार का कान ऐंठती हैं...तार के गर्भ मेंझंकार अब भी बाकी थीतरंगें छिपी थीं तार में बादलों मेंबिजलियों की तरहसुर प्रतीक्षा में थेउम्र के आखिरी पड़ाव तक भी!स्पर्श की यादरोशनी बो गईसुनसान जंगलसपनों में खो गया पेड़ झूमने लगेसितार को फिर मिल गई एक संगत...सितार जीने लगी तरंगें स्पर्शो के अहसास में आदमी के एकांत की तरह!","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}