{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Need Ka Nirman | Harivansh Rai Bachchan ","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/32a2ea57\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":175,"description":"नीड़ का निर्माण | हरिवंश राइ बच्चन \nनीड़ का निर्माण फिर-फिर,\nनेह का आह्वान फिर-फिर!\nवह उठी आँधी कि नभ में\nछा गया सहसा अँधेरा,\nधूलि धूसर बादलों ने\nभूमि को इस भाँति घेरा,\nरात-सा दिन हो गया, फिर\nरात आ‌ई और काली,\nलग रहा था अब न होगा\nइस निशा का फिर सवेरा,\nरात के उत्पात-भय से\nभीत जन-जन, भीत कण-कण\nकिंतु प्राची से उषा की\nमोहिनी मुस्कान फिर-फिर!\nनीड़ का निर्माण फिर-फिर,\nनेह का आह्वान फिर-फिर!\nवह चले झोंके कि काँपे\nभीम कायावान भूधर,\nजड़ समेत उखड़-पुखड़कर\nगिर पड़े, टूटे विटप वर,\nहाय, तिनकों से विनिर्मित\nघोंसलो पर क्या न बीती,\nडगमगा‌ए जबकि कंकड़,\nईंट, पत्थर के महल-घर;\nबोल आशा के विहंगम,\nकिस जगह पर तू छिपा था,\nजो गगन पर चढ़ उठाता\nगर्व से निज तान फिर-फिर!\nनीड़ का निर्माण फिर-फिर,\nनेह का आह्वान फिर-फिर!\nक्रुद्ध नभ के वज्र दंतों\nमें उषा है मुसकराती,\nघोर गर्जनमय गगन के\nकंठ में खग पंक्ति गाती;\nएक चिड़िया चोंच में तिनका\nलि‌ए जो जा रही है,\nवह सहज में ही पवन\nउंचास को नीचा दिखाती!\nनाश के दुख से कभी\nदबता नहीं निर्माण का सुख\nप्रलय की निस्तब्धता से\nसृष्टि का नव गान फिर-फिर!\nनीड़ का निर्माण फिर-फिर,\nनेह का आह्वान फिर-फिर!","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}