{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Sangatkaar | Manglesh Dabral","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/34f6d51a\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":184,"description":"संगतकार | मंगलेश डबराल\n\nमुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देती \nवह आवाज़ सुंदर कमज़ोर काँपती हुई थी \nवह मुख्य गायक का छोटा भाई है \nया उसका शिष्य \nया पैदल चलकर सीखने आने वाला दूर का कोई रिश्तेदार \nमुख्य गायक की गरज में \nवह अपनी गूँज मिलाता आया है प्राचीन काल से \nगायक जब अंतरे की जटिल तानों के जंगल में \nखो चुका होता है \nया अपने ही सरगम को लाँघकर \nचला जाता है भटकता हुआ एक अनहद में \nतब संगतकार ही स्थाई को सँभाले रहता है \nजैसे समेटता हो मुख्य गायक का पीछे छूटा हुआ सामान \nजैसे उसे याद दिलाता हो उसका बचपन \nजब वह नौसिखिया था\n\nतारसप्तक में जब बैठने लगता है उसका गला \nप्रेरणा साथ छोड़ती हुई उत्साह अस्त होता हुआ \nआवाज़ से राख जैसा कुछ गिरता हुआ \nतभी मुख्य गायक हो ढाढ़स बंधाता \nकहीं से चला आता है संगतकार का स्वर \nकभी-कभी वह यों ही दे देता है उसका साथ \nयह बताने के लिए कि वह अकेला नहीं है \nऔर यह कि फिर से गाया जा सकता है \nगाया जा चुका राग \nऔर उसकी आवाज़ में जो एक हिचक साफ़ सुनाई देती है \nयों अपने स्वर को ऊँचा न उठाने की जो कोशिश है \nउसे विफलता नहीं \nउसकी मनुष्यता समझा जाना चाहिए।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}