{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Kaash Ki Pehle Likhi Jaati Ye Kavitayein | Priyadarshan","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/387600fd\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":216,"description":"काश कि पहले लिखी जातीं ये कविताएँ - प्रियदर्शन एकवह एक उजली नाव थी जो गहरे आसमान में तैर रही थीचाँदनी की झिलमिल पतवार लेकर कोई तारा उसे खे रहा थाआकाशगंगाएँ गहरी नींद में थींअपनी सुदूर जमगग उपस्थिति से बेख़बररात इतनी चमकदार थी कि काला आईना बन गई थीसमय-समय नहीं था एक सम्मोहन था जिसमें जड़ा हुआ था यह सारा दृश्ययह प्रेम का पल था जिसका जादू टूटा तो सारे आईने टूट गए।दोवह एक झील थी जो आँखों में बना करती थीइंद्रधनुष के रंग चुराकर सपने अपनी पोशाक सिला करते थेकामनाओं के खौलते समुद्र उसके आगे मुँह छुपाते थेएक-एक पल की चमक में न जाने कितने प्रकाश वर्षों का उजाला बसा होता थाजिस रेत पर चलते थे वह दोस्त हो जाती थीजिस घास को मसलते थे, वह राज़दार बन जाती थीकल्पनाएँ जैसे चुकती ही नहीं थींसामर्थ्य जैसे सँभलती ही नहीं थीसमय जैसे बीतता ही नहीं थावह भी एक जीवन था जो हमने जिया थातीनवह एक शहर था जो रोज़ नए रूप धरता थाहर गली में कुछ बदल जाता, कुछ नया हो जातालेकिन हमारी पहचान उससे इतनी पक्की थी कि उसके तिलिस्म से बेख़बर हम चलते जाते थेरास्ते बेलबूटों की तरह पाँवों के आगे बिछते जातेन कहीं खोने का अंदेशा न कुछ छूटने का डरन कहीं पहुँचने की जल्दी न किसी मंज़िल का पतावे आश्वस्ति भरे रास्ते कहीं खो गएवे अपनेपन के घर खंडहर हो गएहम भी न जाने कहाँ आ पहुँचेकभी ख़ुद को पहचानने की कोशिश करते हैंकभी इस शहर को। कुछ वह बदल गयाकुछ हम बीत गए।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}