{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Saundarya Ka Aashcharyalok | Savita Singh","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/39407ed6\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":149,"description":"सौंदर्य का आश्चर्यलोक | सविता सिंहबचपन में घंटों माँ को निहारा करती थीमुझे वह बेहद सुंदर लगती थीउसके हाथ कोमल गुलाबी फूलों की तरह थेपाँव ख़रगोश के पाँव जैसेउसकी आँखें सदा सपनों से सराबोर दिखतींउसके लंबे काले बाल हर पल उलझाए रखते मुझेयाद है सबसे ज़्यादा मैं उसके बालों से ही खेला करती थीउसे गूँथती फिर खोलती थीजब माँ नहा-धोकर तैयार होतीसाड़ी बाँधतीमेरे लिए वह विश्व का सुंदरतम दृश्य होताजिसके रंगों और ख़ुशबुओं में मैं यूँ खो जातीजैसे कोई एलिस आश्चर्यलोक मेंजब मैं थोड़ी बड़ी हुईमुझे अपनी बड़ी बहन दुनिया की सबसे सुंदरलड़की लगने लगीउसकी लगभग सोने जैसी देहअपनी दमक से संसार को भरतीउसे भी मैं घंटों देखती जब वह तैयार होतीनहा-धोकर लगभग माँ की तरह हीअपने लंबे बालों को सुखाती सँवारती बाँधतीउसकी आँखें माँ की आँखों से भी ज़्यादास्वप्निल दिखतींअब मुझे अपनी बेटियाँ इतनी सुंदर लगती हैंकि मैं उनके पाँवों को चूमती रहती हूँमन ही मन ख़ुश होती हूँकि एक स्त्री हूँऔर घिरी हूँ इतने सौंदर्य से।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}