{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Antim Unchai | Kunwar Narayan","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/3bf16885\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":177,"description":"अंतिम ऊँचाई - कुँवर नारायण\nकितना स्पष्ट होता आगे बढ़ते जाने का मतलब\nअगर दसों दिशाएँ हमारे सामने होतीं,\nहमारे चारों ओर नहीं।\nकितना आसान होता चलते चले जाना\nयदि केवल हम चलते होते\nबाक़ी सब रुका होता।\nमैंने अक्सर इस ऊलजलूल दुनिया को\nदस सिरों से सोचने और बीस हाथों से पाने की कोशिश में\nअपने लिए बेहद मुश्किल बना लिया है।\nशुरू-शुरू में सब यही चाहते हैं\nकि सब कुछ शुरू से शुरू हो,\nलेकिन अंत तक पहुँचते-पहुँचते हिम्मत हार जाते हैं।\nहमें कोई दिलचस्पी नहीं रहती\nकि वह सब कैसे समाप्त होता है\nजो इतनी धूमधाम से शुरू हुआ था\nहमारे चाहने पर।\nदुर्गम वनों और ऊँचे पर्वतों को जीतते हुए\nजब तुम अंतिम ऊँचाई को भी जीत लोगे—\nजब तुम्हें लगेगा कि कोई अंतर नहीं बचा अब\nतुममें और उन पत्थरों की कठोरता में\nजिन्हें तुमने जीता है—\nजब तुम अपने मस्तक पर बर्फ़ का पहला तूफ़ान झेलोगे\nऔर काँपोगे नहीं—\nतब तुम पाओगे कि कोई फ़र्क़ नहीं\nसब कुछ जीत लेने में\nऔर अंत तक हिम्मत न हारने में।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}