{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Khidkiyan | Kumar Vikal","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/3c572543\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":174,"description":"खिड़कियाँ -  कुमार विकल\nजिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं\nउनमें रहने वाले बच्चों का\nसूरज के साथ किस तरह का रिश्ता होता है?\nसूरज उन्हें उस अमीर मेहमान —सा लगता है\nजो किसी सुदूर शहर से\nकभी —कभार आता है\nएकाध दिन के लिए घर में रुकता है\nसारा वक्त माँ से हँस—हँस के बतियाता है\nऔर जाते समय\nउन सबकी मुठ्ठियों में\nकुछ रुपये ठूँस जाता है|\nजिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं\nवहाँ से धूप बाहर की दीवार से लौट जाती है\nजैसे किसी बच्चे के बीमार पड़ने पर\nमाँ की कोई सहेली मिजाजपुर्सी के लिए तो आती है\nकिंतु घर की दहलीज़ से ही\nहाल पूछ पर चली जाती है|\nजिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं\nवहाँ के बच्चों को रोशनी की प्रतीक्षा—\nकुछ इस तरह से होती है\nजिस तरह राखी के कुछ दिनों बाद\nघर के सामने से\nपोस्टमैन के गुज़र जाने के बाद\nपहले पोस्टमैन को कोसती है\nबाद में रसोई में जाकर\nअपने भाई की मजबूरी समझ कर\nबहुत रोती है|\nजिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं\nवहाँ पर चाँदनी कुछ इस तरह से आती है\nजैसे किसी खिड़कियों वाले घर में\nपक रहे पकवानों की ख़ुशबू\nदूर तक के घरों में फैल जाती है|\nजिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं\nवहाँ पर कोई लोरियाँ नहीं गाता\nचाँद को चंदा मामा नहीं कहता\nपियक्कड़ पिता की आवाज़ ही बच्चों को सुलाती है\nऔर किसी औरत के सिसकने की आवाज़\nचौकीदार के ‘जागते रहो’ स्वर में खो जाती है|","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}