{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Ladki | Anju Sharma","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/3e9aca5c\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":185,"description":"लड़की | अंजू शर्मा\n\nएक दिन समटते हुए अपने खालीपन को\nमैंने ढूँढा था उस लड़की को,\nजो भागती थी तितलियों के पीछे\nसँभालते हुए अपने दुपट्टे को\nफिर खो जाया करती थी\nकिताबों के पीछे,\n\nगुनगुनाते हुए ग़ालिब की कोई ग़ज़ल\nअक्सर मिल जाती थी वो लाईब्रेरी में,\nकभी पाई जाती थी घर के बरामदे में\nबतियाते हुए प्रेमचंद और शेक्सपियर से,\n\nकभी बारिश में तलते पकौड़ों\nको छोड़कर\nखुले हाथों से छूती थी आसमान,\nऔर ज़ोर से सांस खींचते हुए\nसमो लेना चाहती थी पहली बारिश\nमें महकती सोंधी मिट्टी की खुशबू,\n\nउसकी किताबों में रखे\nसूखे फूल महका करते थे\nउसके अल्फाज़ की महक से,\nऔर शब्द उसके इर्द-गिर्द नाचते\nऔर भर दिया करते थे\nउसकी डायरी के पन्ने,\n\nदोस्तों की महफ़िल छोड़\nछत पर निहारती थी वो\nबादल और बनाया करती थी\nउनमें अनगिनित शक्लें,\nतब उसकी उंगलियाँ अक्सर\nमुंडेर पर लिखा करती थी कोई नाम,\n\nउसकी चुप्पी को लोग क्यों\nनहीं पढ़ पाते थे उसे परवाह नहीं थी,\nहाँ, क्योंकि उसे जानते थे\nध्रुव तारा, चाँद और सितारे,\n\nफिर एक दिन वो लड़की कहीं\nखो गयी\nसोचती हूँ क्या अब भी उसे प्यार\nहै किताबों से\nक्या अब भी लुभाते हैं उसे नाचते अक्षर,\nक्या अब भी गुनगुनाती है वो ग़ज़लें,\n\nकभी मिले तो पूछियेगा उससे\nऔर कहियेगा कि उसके झोले में\nरखे रंग और ब्रुश अब सूख गए हैं\nऔर पीले पड़ गए हैं गोर्की की\nकिताब के पन्ने,\nदेवदास और पारो अक्सर उसे\nयाद करते हैं\n\nकहते हैं वो मेरी हमशक्ल थी","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}