{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Keerti ka Vihan Hun | Kanhaiya Lal Pandya 'Suman'","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/408fe6bd\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":156,"description":"कीर्ति का विहान हूँ | स्व. कन्हैया लाल पण्ड्या ‘सुमन’मैं स्वतंत्र राष्ट्र की कीर्ति का विहान हूँ।काल ने कहा रुकोशक्ति ने कहा झुकोपाँव ने कहा थकोकिन्तु मैं न रुक सका, न झुक सका, न थक सकाक्योंकि मैं प्रकृति प्रबोध का सतत् प्रमाण हूँकीर्ति का विहान हूँ।भीत ने कहा डरोज्वाल ने कहा जरोमृत्यु ने कहा मरोकिन्तु मैं न डर सका, न जर सका, न मर सकाक्योंकि राष्ट्र भाग्य-व्योम का ज्वलंत प्राण हूँकीर्ति का विहान हूँ।ले नवीन साधनाले नवीन कामनाले नवीन भावनानाश से न मैं फिरा, न मैं गिरा, न मैं डराक्योंकि मैं सृजन नवीन का अजर निशान हूँकीर्ति का विहान हूँ।मैं नया तूफ़ान हूँमैं नया वितान हूँमैं नया विधान हूँदेश के सौभाग्य का भूत-वर्त-भावी हूँराष्ट्र के सघन तिमिर के नाश में प्रधान हूँकीर्ति का विहान हूँ।मैं नया विकास हूँमैं नया प्रकाश हूँमैं नवीन आश हूँमैं नवीन दृश्य हूँ, भविष्य हूँ, मनुष्य हूँक्योंकि मैं क्षितिज अनन्त सा नया वितान हूँकीर्ति का विहान हूँ।मैं स्वतंत्र राष्ट्र की कीर्ति का विहान हूँ।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}