{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Ho Sakta Hai | Ashok Vajpeyi","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/40aa0255\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":174,"description":"हो सकता है - अशोक वाजपेयी \nहो सकता है, इस बार हम \nअसमय आ गए हों\nहर समय कुछ ना कुछ का\nअंत हो रहा होता है\nऔर उसी समय\nकुछ ना कुछ का आरंभ भी\nऐसा लग सकता है कि\nअंत ही आरंभ है\nऔर आरंभ ही अंत है\nठीक-ठीक समय तय कर पाना मुश्किल है\nक्योंकि हर आना अंत है, आरंभ भी\nजब मनुष्य अपने एकांत में \nविलप रहा होता है,\nतब हरितिमा बाहर\nखिलखिला रही होती है\nफूलों को कतई ख़बर नहीं\nकि मनुष्य के आंसू क्या होते हैं\nप्रकृति ना हँसती है ना रोती है\nफिर भी माटी का चोला पहने मनुष्य\nउसपर भरोसा करता है\nजबकि जीना हर दिन\nअंत के और पास जाना है\nनष्ट करने का उत्साह बढ़ता जाता है\nकम होती जाती है\nइच्छा कुछ रचने की\nकम होती जाती हैं जगहें\nठिठककर कुछ सोचने की\nजो नष्ट करता है, वो अपने को भी\nनष्ट कर रहा होता है\nजो रचता है, वो अपने को बचा रहा होता है\nभुरभुरा है नाश का स्थापत्य\nभुरभुरा है रचने का स्थापत्य\nकोई नहीं बचता नश्वरता के श्राप से\nखिड़कियाँ और दरवाज़े सब खुले हैं\nखुला है आंगन\nउन्हीं में होकर आती है पदचाप\nना होने की\nहम उसी पदचाप की ओर \nआपका ध्यान खींचने  \nशायद असमय आ गए हैं।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}