{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Ma | Padma Sachdeva","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/40dcfbe5\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":147,"description":"माँ । पद्मा सचदेव\nबुलाने के लिए कई नाम हैं\nजिसे पुकारो बोलता भी हैपर एक नाम ऐसा है जिसे पुकारो तो\nसब चौकन्ने हो जाते हैंसभी सोचते हैं ये नाम मेरे लिए तो नहीं\nमाँ... माँ... माँ...ओ लड़के\nओ बेटावह मेरी बेटी\nकहाँ मर गई होमाँ माँ माँ कहता जब कोई बच्चा\nगली में से निकलता हैसड़क पार करता है\nया पहाड़ चढ़ता हैपहाड़ उतरकर आँगन में आ खड़ा होता है\nतब माँ एकदम सुबह के गुलाब की तरहखिल उठती है\nदोनों दरवाज़े थाम कर देखती हैगलियों में जाते, गुल्ली-डंडा घुमाते, गिट्टे उछालते\nमाँ माँ कहकर लिपट जाते हैंमाँ को सब एक तरह से ही बुलाते हैं\nमधुरता में नहला कर, चाव से भर करज़रा-सा डर कर आतुरता से\nमाँ... माँ... माँबछड़ा रंभाता है बां बां बां\nगाय कई बार रस्सी तोड़ने का यत्न करती हैमालिक का कोई डर नहीं रहता\nकोई भी उलझन हो, कोई भी ख़ुशी हो, कोई भी उम्र होकहता है माँ, माँ कहाँ हो तुम माँ\nहाय बाप कोई नहीं कहता","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}