{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Meri Bansuri Meri Bhasha Hai | Shahanshah Alam","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/40e363f3\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":239,"description":"मेरी बाँसुरी मेरी भाषा है | शहंशाह आलम | शहंशाह आलम\n\nसुबह उठा तो देर शाम को घर पहुँचा सूरज\nचाँद था कि रात भर जागा क़बीले में अथक\n\nहम दिन भर शहरी हुए और रात को आदिवासी\n\nयह मेरी भाषा की आवाज़ थी जो पहुँच रही थी\nआदमी के झुंड में पूरी तरह साफ़ सुनी जाने वाली\nइतनी साफ़ भाषा कि हम लड़ सकें अपने शत्रुओं से\n\nमेरी भाषा मेरी बाँसुरी है और बाँसुरी मेरी आवाज़\n\nइसी भाषा के सहारे बादलों पर चलता-फिरता हुआ\nतुम तक पहुँचता रहा था पुराना परिचित बनकर\n\nआम के पकने और शहद के मीठे होने वाले इन दिनों में \nउदासी कहाँ थी मेघ के चेहरे पर पिछले कई माह वाली\n\nउदासी को तुम्हारे अलावा कौन अपना मान सकता है\n\nसहस्र बार तुम्हारे घर गया पूर्णिमा वाला उदित मेरा चाँद\nतुम्हारे कहने से ताकि तुम मुझे रोक लो यात्रा पर जाने से\nऔर मैं जितना कविता में कह लेता था बुद्ध बनकर\nतुम्हारे समक्ष कहाँ सुना पाता था कोई मार्मिक वृत्तांत\nएक सच यह भी था कि हमने कितने-कितने जीवाश्म\nइकट्ठा किए साथ रहकर उस टेढ़े-मेढ़े गुप्त सुरंग में\n\nमेरा निरापद, सरल और प्राचीन प्रेम भी जीवाश्म ठहरा\nअगर तुम मानते हो प्रेम को पूर्ण प्रेम भाषा को पूर्ण भाषा \n\nअगर तुम जकड़ लेते अपने आलिंगनपाश में बारिश वाली रात\nमेरी बाँसुरी की आवाज़ को प्रेम की नई खोज स्वीकारते\n\nअपनी सहस्र यात्राएँ पूरी कर लौट आता तुम्हारे समय के सच में।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}