{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Main Tumhe Phir Milungi | Amrita Pritam","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/4159f100\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":150,"description":"मैं तुम्हें फिर मिलूँगी - अमृता प्रीतम\n \nमैं तुम्हें फिर मिलूँगी \nकहाँ? किस तरह? नहीं जानती \nशायद तुम्हारे तख़्ईल की चिंगारी बन कर \nतुम्हारी कैनवस पर उतरूँगी \nया शायद तुम्हारी कैनवस के ऊपर \nएक रहस्यमय रेखा बन कर \nख़ामोश तुम्हें देखती रहूँगी \nया शायद सूरज की किरन बन कर \nतुम्हारे रंगों में घुलूँगी \nया रंगों की बाँहों में बैठ कर \nतुम्हारे कैनवस को \nपता नहीं कैसे-कहाँ? \nपर तुम्हें ज़रूर मिलूँगी \nया शायद एक चश्मा बनी होऊँगी \nऔर जैसे झरनों का पानी उड़ता है \nमैं पानी की बूँदें \nतुम्हारे जिस्म पर मलूँगी \nऔर एक ठंडक-सी बन कर \nतुम्हारे सीने के साथ लिपटूँगी... \nमैं और कुछ नहीं जानती \nपर इतना जानती हूँ \nकि वक़्त जो भी करेगा \nइस जन्म मेरे साथ चलेगा... \nयह जिस्म होता है \nतो सब कुछ ख़त्म हो जाता है \nपर चेतना के धागे \nकायनाती कणों के होते हैं \nमैं उन कणों को चुनूँगी \nधागों को लपेटूँगी \nऔर तुम्हें मैं फिर मिलूँगी... ","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}