{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Khichdi | Anamika","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/43315fe9\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":173,"description":"खिचड़ी | अनामिकाइतने बरस बीते, इतने बरस ! सन्तोष है तो बस इतना कि मैंने ये बाल धूप में तो सफेद नहीं किए ! इन खिचड़ी बालों का वास्ता, देखा है संसार मैंने भी थोड़ा-सा ! दुनिया के हर कोने क्या जाने क्या-क्या खिचड़ी पक रही है : संसद में, निर्णायक मंडल में, दूर वहाँ इतिहास के खंडहरों में ! 'चाणक्य की खिचड़ी' से लेकर 'बीरबल की खिचड़ी' तक सल्तनतें हैं और रणकौशल ! मुझे खिचड़ी-भाषा से कोई शिकायत नहीं ! खिचड़ी गरीब मेहनतकश का सबसे सुस्वादु और पौष्टिक भोजन है, पर मैं सुपली में फटककर कुछ कंकड़ चुन लेना चाहती हूँ! और तब धो-धोकर सीधा डबका लेना चाहती हूँ अपना सचसादा हीनमक-मिर्च मिलाए बिना ! डबकाना चाहती हूँ अपना सच उस बड़े सच की हँड़िया में जो साझा है! और चाहे जो हो- साझी सच्चाई काठ की हंड़िया नहीं है कि दुबारा न चढ़े आँच पर ! रोज़ वह करती है आग की सवारी, रोज़ रगड़घस सहती है हमारी-तुम्हारी ! मुझे खिचड़ी-भाषा से कोई शिकायत नहीं। छौंक के करछुल में जीरा बराबर चटक रहे हैं मेरे सपने- इसी में !","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}